पटना: बिहार विधानसभा का मानसून सत्र शुक्रवार को उस समय अचानक गरमा गया, जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के विधायक विशाल प्रशांत ने भूमिहार समुदाय की सामाजिक पहचान और आरक्षण को लेकर ऐसा मुद्दा उठा दिया, जिसने पूरे सदन का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। जाति प्रमाण पत्र से जुड़े एक सवाल पर सरकार के जवाब से असहमति जताते हुए उन्होंने कहा कि यदि सरकार भूमिहार समुदाय को “भूमिहार ब्राह्मण” मानने को तैयार नहीं है, तो फिर इस समुदाय को अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल कर देना चाहिए।
विशाल प्रशांत का यह बयान आते ही सदन में राजनीतिक हलचल तेज हो गई। सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा शुरू हो गई। विधायक ने सरकार से पूछा कि आखिर भूमिहार समुदाय की पहचान को लेकर उसका आधिकारिक रुख क्या है। उन्होंने कहा कि यदि सरकारी दस्तावेजों और प्रमाणपत्रों में “भूमिहार ब्राह्मण” का उल्लेख नहीं किया जाता, तो सरकार को स्पष्ट रूप से यह बताना चाहिए कि वह इस समुदाय को किस सामाजिक वर्ग में मानती है।
उन्होंने सदन में कहा कि यदि सरकार भूमिहारों को ब्राह्मण नहीं मानती, तो उन्हें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की दिशा में पहल करनी चाहिए। उनका यह बयान राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया।
विधानसभा में उठे इस मुद्दे के साथ ही 1931 की जाति जनगणना का संदर्भ भी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया। 1931 की जनगणना को ब्रिटिश भारत की अंतिम विस्तृत जातिवार जनगणना माना जाता है। आजादी के बाद सामान्य जातियों की अलग-अलग गणना नहीं हुई और लंबे समय तक आरक्षण तथा सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े मामलों में 1931 के आंकड़ों का हवाला दिया जाता रहा।
बिहार में जातीय सर्वे और सामाजिक न्याय की राजनीति के बीच 1931 की जनगणना का मुद्दा लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना हुआ है। विभिन्न दल समय-समय पर इन आंकड़ों का उल्लेख कर सामाजिक हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व की मांग उठाते रहे हैं। ऐसे में भूमिहार समुदाय को लेकर विधानसभा में उठी यह मांग केवल एक जाति की पहचान का प्रश्न नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गई है।
इस बहस के बीच बिहार के पूर्व कृषि मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता विजय कुमार सिन्हा का मुजफ्फरपुर में दिया गया बयान भी चर्चा में है। उन्होंने कहा था कि समाज के हर वर्ग को सम्मान मिलना चाहिए और किसी भी समुदाय की पहचान को लेकर भ्रम की स्थिति नहीं रहनी चाहिए।
विजय सिन्हा ने कहा था कि सामाजिक न्याय केवल नारों से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों और संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि 1931 की जाति जनगणना के आधार पर समाज की वास्तविक तस्वीर को समझना जरूरी है और किसी भी वर्ग से जुड़े निर्णय संविधान के दायरे में लिए जाने चाहिए। उनका यह बयान अब विधानसभा में उठी मांग के बाद फिर राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गया है।
किसी भी जाति को अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल करना केवल राजनीतिक घोषणा से संभव नहीं है। इसके लिए संविधान के तहत तय प्रक्रिया का पालन करना होता है। सबसे पहले राज्य सरकार संबंधित समुदाय के बारे में प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजती है। इसके बाद भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI), राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) या राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) उस प्रस्ताव की समीक्षा करते हैं। अंत में संसद की मंजूरी के बाद ही संबंधित सूची में संशोधन किया जा सकता है। यानी विधानसभा में उठी मांग राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे लागू करने के लिए लंबी संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना होगा।
बिहार में जातीय समीकरण हमेशा चुनावी राजनीति का केंद्र रहे हैं। ऐसे में भूमिहार समुदाय की पहचान और आरक्षण को लेकर उठी यह मांग आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है। यह बहस केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक पहचान, आरक्षण व्यवस्था और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे व्यापक सवालों से भी जुड़ी हुई है।
फिलहाल सरकार की ओर से इस मांग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि विधानसभा में उठे इस मुद्दे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार में जातीय राजनीति का मुद्दा अभी भी बेहद संवेदनशील और प्रभावशाली बना हुआ है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार इस विषय पर क्या रुख अपनाती है और क्या यह बहस केवल सदन तक सीमित रहती है या आगे चलकर संवैधानिक और राजनीतिक स्तर पर भी इसका असर दिखाई देता है।