• होम
  • Blog
  • ट्रेन 9 घंटे लेट, यात्री पहुंचा कोर्ट; रेलवे पर ₹35 हजार जुर्माना

ट्रेन 9 घंटे लेट, यात्री पहुंचा कोर्ट; रेलवे पर ₹35 हजार जुर्माना

झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिला उपभोक्ता आयोग का फैसला, 45 दिनों में भुगतान का आदेश; समय पर भुगतान नहीं होने पर 12% सालाना ब्याज भी देना होगा।

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • September 22, 2026 9:45 pm IST, Published 2 hours ago

सरायकेला-खरसावां। ट्रेन का सफर यात्रियों के लिए अक्सर समय की पाबंदी से जुड़ा होता है। लेकिन जब कोई ट्रेन कई घंटे की देरी से अपने गंतव्य तक पहुंचती है, तो इसका असर यात्रियों की आगे की योजनाओं, जरूरी काम और मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है। झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले से सामने आए एक मामले में ट्रेन की करीब नौ घंटे की देरी को लेकर यात्री द्वारा दायर शिकायत पर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने रेलवे को कुल 35 हजार रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग के आदेश में 30 हजार रुपये मुआवजा और 5 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने को कहा गया है।

528 मिनट की देरी से संबलपुर पहुंची ट्रेन

मामला 23 सितंबर 2024 का है। रिपोर्टों के अनुसार, आदित्यपुर-2 के बाबा आश्रम निवासी संजय कुमार ने टाटानगर से संबलपुर जाने के लिए इस्पात एक्सप्रेस में दो स्लीपर टिकट बुक किए थे। ट्रेन को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुबह 10:18 बजे टाटानगर से रवाना होना था और शाम 3:50 बजे संबलपुर पहुंचना था।

हालांकि, ट्रेन अपने निर्धारित समय से काफी देर से गंतव्य पर पहुंची। रिपोर्ट के मुताबिक संबलपुर पहुंचने में ट्रेन को 528 मिनट यानी 8 घंटे 48 मिनट की देरी हुई। इसी लंबी देरी के बाद यात्री ने रेलवे की सेवा को लेकर कानूनी रास्ता अपनाया।

यात्री का कहना था कि इतनी लंबी देरी के कारण उसे शारीरिक, मानसिक और वित्तीय परेशानी का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने रेलवे के संबंधित अधिकारी को कानूनी नोटिस भेजा और उपभोक्ता आयोग में शिकायत दाखिल की।

यात्री ने मांगा था ₹4.50 लाख का मुआवजा

रिपोर्ट के अनुसार, संजय कुमार ने 8 अक्टूबर 2024 को दक्षिण पूर्व रेलवे के सीनियर डिविजनल ऑपरेशंस मैनेजर को कानूनी नोटिस भेजा था। इसके बाद उपभोक्ता आयोग में मामला दायर करते हुए उन्होंने करीब 4.50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी।

शिकायतकर्ता ने अपने दावे के समर्थन में टिकट और कानूनी नोटिस सहित अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किए। उनका पक्ष था कि ट्रेन की अत्यधिक देरी ने उन्हें केवल इंतजार करने की परेशानी नहीं दी, बल्कि इससे उनके समय और यात्रा से जुड़ी योजनाओं पर भी असर पड़ा।

रेलवे ने आयोग के अधिकार क्षेत्र पर उठाए सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से यात्री के दावे का विरोध किया गया। दक्षिण पूर्व रेलवे और ईस्ट कोस्ट रेलवे ने उपभोक्ता आयोग में मामले की सुनवाई के अधिकार क्षेत्र को लेकर आपत्ति जताई।

रेलवे की ओर से यह तर्क दिया गया कि ऐसे मामलों की सुनवाई रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल में होनी चाहिए। इसके अलावा टिकट आईआरसीटीसी के माध्यम से बुक किए जाने का भी उल्लेख किया गया और कहा गया कि आईआरसीटीसी को मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया था।

रेलवे की ओर से यह भी कहा गया कि केवल ट्रेन के देर से पहुंचने से वित्तीय नुकसान स्वतः साबित नहीं होता। रिपोर्ट के अनुसार रेलवे ने यात्री द्वारा अलग से वित्तीय नुकसान के पर्याप्त दस्तावेज पेश नहीं किए जाने की बात भी रखी।

आयोग ने रेलवे की आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया

इस मामले में सरायकेला-खरसावां जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 2 सितंबर 2026 को अपना आदेश दिया। आयोग ने रेलवे की ओर से उठाई गई अधिकार क्षेत्र संबंधी आपत्तियों को खारिज किया और मामले की सुनवाई उपभोक्ता आयोग में किए जाने को उचित माना। रिपोर्टों के अनुसार आयोग ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया।

मामले में आयोग ने ट्रेन की देरी और यात्री को हुई परेशानी को प्रमुखता से देखा। रिपोर्ट के अनुसार, रेलवे की ओर से ट्रेन में हुई देरी का ऐसा कारण साबित नहीं किया जा सका जिसे रेलवे के नियंत्रण से बाहर माना जा सके।

आयोग ने यह भी माना कि इतनी लंबी देरी से यात्री को हुई परेशानी को केवल इस आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उसने वित्तीय नुकसान से संबंधित अलग दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए हैं। इसी आधार पर यात्री को मानसिक और शारीरिक परेशानी के लिए मुआवजा देने का आदेश हुआ।

रेलवे को 45 दिनों में देना होगा ₹35 हजार

आयोग के आदेश के मुताबिक रेलवे को शिकायतकर्ता को 30 हजार रुपये मुआवजे के रूप में और 5 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के तौर पर देने होंगे। इस तरह कुल भुगतान राशि 35 हजार रुपये होगी।

रेलवे को यह राशि आदेश के अनुसार 45 दिनों के भीतर चुकानी होगी। यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया जाता है, तो आदेश की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 12 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देय होगा।

यात्रियों के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण मामला

यह फैसला ऐसे यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें ट्रेन की अत्यधिक देरी के कारण गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर ट्रेन की देरी पर स्वतः मुआवजा मिलना तय है। किसी मामले में मुआवजे का निर्णय संबंधित तथ्यों, उपलब्ध दस्तावेजों और न्यायिक मंच के निष्कर्षों पर निर्भर करता है।

इस मामले की खास बात यह है कि यात्री ने ट्रेन की देरी को लेकर शिकायत दर्ज कराने के साथ-साथ दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी की और उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद रेलवे को मुआवजा और मुकदमे का खर्च देने का आदेश दिया।

ट्रेन में करीब नौ घंटे की देरी से जुड़ा यह मामला एक बार फिर यात्रियों की अपेक्षाओं और रेलवे की सेवा संबंधी जवाबदेही के मुद्दे को सामने लाता है। खासकर लंबी दूरी की यात्रा में समय पर पहुंचना यात्रियों के लिए जरूरी होता है, क्योंकि ट्रेन की देरी का असर आगे की यात्रा, कामकाज और अन्य निर्धारित कार्यक्रमों पर पड़ सकता है।

नोट: यह समाचार उपलब्ध रिपोर्टों और साझा की गई सामग्री के आधार पर स्वतंत्र भाषा में तैयार किया गया है। मुआवजे की राशि, देरी का समय और आयोग के आदेश से जुड़े तथ्य प्रकाशित रिपोर्टों से मिलान किए गए हैं।

Advertisement