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पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन, लोककला जगत में शोक की लहर

रायपुर : भारतीय लोककला जगत के लिए बेहद दुखद समाचार सामने आया है। देश की सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उन्होंने रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि एम्स रायपुर के जनसंपर्क विभाग द्वारा की […]

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  • July 5, 2026 11:04 am IST, Published 12 seconds ago

रायपुर : भारतीय लोककला जगत के लिए बेहद दुखद समाचार सामने आया है। देश की सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उन्होंने रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि एम्स रायपुर के जनसंपर्क विभाग द्वारा की गई। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के सांस्कृतिक और कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, तीजन बाई पिछले कई सप्ताह से गंभीर रूप से बीमार थीं और उनका उपचार रायपुर एम्स में चल रहा था। रविवार तड़के करीब 3:15 बजे उनकी तबीयत अचानक अधिक बिगड़ गई, जिसके बाद चिकित्सकों के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर सामने आते ही कला प्रेमियों, साहित्यकारों, लोक कलाकारों और राजनीतिक हस्तियों ने गहरा दुख व्यक्त किया।

तीजन बाई का जन्म वर्ष 1956 में छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाओं और लोक परंपराओं में विशेष रुचि थी। सीमित संसाधनों और सामाजिक चुनौतियों के बीच उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर पंडवानी गायन को नई पहचान दिलाई। उनके जीवन का संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत माना जाता है।

पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक पारंपरिक लोकगायन शैली है, जिसमें महाभारत की कथाओं का संगीत और अभिनय के माध्यम से प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण किया जाता है। तीजन बाई ने इस कला को देश-विदेश तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी प्रस्तुति में गायन के साथ अभिनय, भाव-भंगिमाएं और संवाद अद्भुत समन्वय के साथ देखने को मिलते थे।

विशेष बात यह रही कि उन्होंने पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ को अपनाया, जिसे उस समय मुख्य रूप से पुरुष कलाकार प्रस्तुत करते थे। सामाजिक विरोध और अनेक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर उनकी ऊर्जावान प्रस्तुति दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थी। उनकी दमदार आवाज और प्रभावशाली अभिनय ने पंडवानी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा दिलाई।

भारतीय लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें समय-समय पर कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और बाद में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुए।

तीजन बाई ने भारत के अलावा दुनिया के कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियां दीं। उनके कार्यक्रमों ने विदेशी दर्शकों को भारतीय लोक परंपरा से परिचित कराया। उन्होंने यह साबित किया कि लोककला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक विरासत और इतिहास को जीवंत बनाए रखने का सशक्त माध्यम भी है।

उनके निधन पर विभिन्न राजनीतिक नेताओं, कलाकारों और सामाजिक संगठनों ने श्रद्धांजलि अर्पित की है। कई सांस्कृतिक संस्थाओं ने कहा कि तीजन बाई का जाना भारतीय लोककला की अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपने पूरे जीवन में लोक संस्कृति को समर्पित रहकर जिस तरह नई पीढ़ी को प्रेरित किया, उसे हमेशा याद रखा जाएगा।

छत्तीसगढ़ सरकार ने भी उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि तीजन बाई ने राज्य की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। राज्य के विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों ने उनके सम्मान में श्रद्धांजलि सभाओं के आयोजन की घोषणा की है।

लोककला विशेषज्ञों का मानना है कि तीजन बाई का योगदान केवल पंडवानी तक सीमित नहीं था। उन्होंने महिला कलाकारों के लिए भी नई राह खोली। जिस दौर में लोक मंचों पर महिलाओं की भागीदारी सीमित थी, उस समय उन्होंने अपने साहस और प्रतिभा के बल पर नई मिसाल कायम की। यही कारण है कि आज देशभर की अनेक युवा लोक कलाकार उन्हें अपना आदर्श मानती हैं।

तीजन बाई का जीवन इस बात का प्रमाण है कि कठिन परिस्थितियां भी प्रतिभा और दृढ़ संकल्प के सामने टिक नहीं सकतीं। उन्होंने अपनी कला के माध्यम से भारतीय संस्कृति, लोक परंपरा और महाभारत की अमर गाथाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य किया। उनका निधन भारतीय लोककला जगत के लिए एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं है। उनकी अमर प्रस्तुतियां और सांस्कृतिक योगदान सदैव देशवासियों के दिलों में जीवित रहेंगे।

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