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74 देशों में प्रतिबंधित जहरीला केमिकल, भारत के खेतों में अब भी इस्तेमाल! किसानों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की बढ़ी चिंता

नई दिल्ली : दुनिया के कई देशों में प्रतिबंधित या कड़े नियंत्रण के दायरे में रखा गया खरपतवारनाशी रसायन पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। कृषि क्षेत्र में खरपतवार नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाला यह केमिकल अपनी अत्यधिक विषाक्तता के कारण लंबे समय से विवादों में रहा है। […]

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  • June 12, 2026 4:30 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली : दुनिया के कई देशों में प्रतिबंधित या कड़े नियंत्रण के दायरे में रखा गया खरपतवारनाशी रसायन पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। कृषि क्षेत्र में खरपतवार नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाला यह केमिकल अपनी अत्यधिक विषाक्तता के कारण लंबे समय से विवादों में रहा है। विशेषज्ञों का दावा है कि दुनिया के 70 से अधिक देशों में इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है, लेकिन भारत में इसका उपयोग अब भी कई क्षेत्रों में जारी है। यही वजह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ, पर्यावरणविद् और किसान संगठनों के बीच इसके उपयोग को लेकर बहस तेज हो गई है।

पैराक्वाट को दुनिया के सबसे खतरनाक खरपतवारनाशकों में गिना जाता है। यह खेतों में उगने वाली अवांछित घास और खरपतवार को तेजी से नष्ट करता है, इसलिए कई किसान इसे प्रभावी मानते हैं। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी थोड़ी-सी मात्रा भी इंसानों और जानवरों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यदि यह रसायन शरीर में प्रवेश कर जाए तो इसके प्रभाव को पूरी तरह रोकने के लिए कोई निश्चित एंटीडोट उपलब्ध नहीं है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार पैराक्वाट का सेवन या इसके अत्यधिक संपर्क से फेफड़े, किडनी और लिवर गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं। कई मामलों में यह स्थायी अंग क्षति और मृत्यु का कारण भी बनता है। ग्रामीण क्षेत्रों में दुर्घटनावश या आत्महत्या के प्रयासों में इसके सेवन से बड़ी संख्या में मौतों की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। यही कारण है कि कई देशों ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया।

पर्यावरण विशेषज्ञ भी इस रसायन को लेकर चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि खेतों में लगातार उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और आसपास के जल स्रोतों पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा खेतों में काम करने वाले मजदूर और किसान बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के इसके संपर्क में आते हैं, जिससे स्वास्थ्य जोखिम और बढ़ जाता है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खरपतवार नियंत्रण के लिए सुरक्षित और आधुनिक विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन उनके प्रति जागरूकता की कमी और कम लागत के कारण कई किसान अब भी पैराक्वाट का उपयोग कर रहे हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को किसानों को वैकल्पिक तकनीकों और कम विषैले खरपतवारनाशकों के बारे में प्रशिक्षण देना चाहिए, ताकि फसल उत्पादन भी प्रभावित न हो और स्वास्थ्य जोखिम भी कम किया जा सके।

इस बीच कई सामाजिक और पर्यावरण संगठनों ने केंद्र सरकार से पैराक्वाट के उपयोग की व्यापक समीक्षा करने और इसके नियमन को और सख्त बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि किसानों की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए इस रसायन पर वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि खेती में उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में पैराक्वाट डाइक्लोराइड को लेकर चल रही बहस आने वाले समय में कृषि नीति और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हो सकती है।

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