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स्कूलों में सेक्स एजुकेशन पर केंद्र का बड़ा प्लान, जानें पूरी बात

नई दिल्ली। देशभर के स्कूलों में व्यापक सेक्स एजुकेशन (Comprehensive Sexuality Education) को लेकर लंबे समय से चल रही बहस एक बार फिर चर्चा में है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान संकेत दिया है कि स्कूलों में सेक्स एजुकेशन को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने की दिशा में तैयारी की जा […]

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  • July 15, 2026 12:30 am IST, Published 43 minutes ago

नई दिल्ली। देशभर के स्कूलों में व्यापक सेक्स एजुकेशन (Comprehensive Sexuality Education) को लेकर लंबे समय से चल रही बहस एक बार फिर चर्चा में है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान संकेत दिया है कि स्कूलों में सेक्स एजुकेशन को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने की दिशा में तैयारी की जा रही है। हालांकि इसे लागू करने से पहले न्यायालय की प्रक्रिया और आवश्यक मंजूरी का इंतजार किया जाएगा।

यह मामला किशोरों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों, पॉक्सो (POCSO) कानून के उपयोग और बच्चों के अधिकारों से जुड़ा है। सरकार का कहना है कि बदलते सामाजिक परिवेश में बच्चों और किशोरों को सही उम्र में वैज्ञानिक एवं तथ्यात्मक जानकारी देना आवश्यक है, ताकि वे सुरक्षित, जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बन सकें।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि सरकार स्कूलों में सेक्स एजुकेशन लागू करने की तैयारी कर रही है। अदालत की मंजूरी और आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में किशोरों के आपसी सहमति से बने संबंधों और पॉक्सो कानून के इस्तेमाल से जुड़े मामलों पर सुनवाई चल रही है। अदालत ने इस दौरान चिंता जताई कि कई मामलों में 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोर-किशोरियां आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं, लेकिन बाद में परिवार की शिकायत पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हो जाते हैं। ऐसे मामलों में कानून के दुरुपयोग की संभावना पर भी न्यायालय ने टिप्पणी की।

इसी संदर्भ में केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि बच्चों और किशोरों को सही समय पर वैज्ञानिक एवं स्वास्थ्य संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है। सरकार का मानना है कि उचित शिक्षा मिलने से किशोरों में जागरूकता बढ़ेगी और कई सामाजिक समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है।

इस विषय पर केंद्र सरकार ने पहले महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव की अध्यक्षता में 26 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। समिति को किशोरों की निजता, आपसी सहमति, पॉक्सो कानून के प्रभाव तथा बच्चों की सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई थी।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि स्कूलों के पाठ्यक्रम में व्यापक यौन शिक्षा, बच्चों की सुरक्षा, लैंगिक समानता, व्यक्तिगत सीमाएं, यौन शोषण से बचाव, ऑनलाइन सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को शामिल किया जाना चाहिए। रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई कि इस विषय का पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा तैयार किया जाए ताकि पूरे देश में एक समान और वैज्ञानिक सामग्री उपलब्ध हो सके।

विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया कि नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप इस विषय को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए। रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को उनकी आयु के अनुरूप जानकारी दी जानी चाहिए। इसके लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति की जाए और सप्ताह में दो बार लगभग 20 मिनट की विशेष कक्षाएं आयोजित करने का प्रस्ताव भी रखा गया है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सेक्स एजुकेशन का उद्देश्य केवल यौन संबंधों की जानकारी देना नहीं होता, बल्कि बच्चों को उनके शरीर, मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तिगत सुरक्षा, अच्छे और बुरे स्पर्श की पहचान, साइबर सुरक्षा, लैंगिक सम्मान और जिम्मेदार व्यवहार के बारे में जागरूक करना भी होता है। इससे बच्चों के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और वे किसी भी प्रकार के शोषण या गलत व्यवहार की पहचान कर समय रहते मदद मांग सकते हैं।

हालांकि इस विषय को लेकर समाज में अलग-अलग मत भी मौजूद हैं। कुछ लोग इसे आधुनिक शिक्षा की आवश्यकता बताते हैं, जबकि कुछ संगठनों का मानना है कि इस विषय को पढ़ाने का तरीका और आयु-उपयुक्त सामग्री बेहद सावधानी से तय की जानी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पाठ्यक्रम वैज्ञानिक तथ्यों, भारतीय सामाजिक मूल्यों और बच्चों की उम्र के अनुरूप तैयार किया जाए तो यह शिक्षा बच्चों के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से अदालत में रखे गए पक्ष और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर यह स्पष्ट है कि स्कूलों में व्यापक सेक्स एजुकेशन को लेकर गंभीर स्तर पर विचार किया जा रहा है। हालांकि इसे पूरे देश में लागू करने के लिए अभी न्यायिक प्रक्रिया, नीति निर्धारण और संबंधित संस्थाओं की मंजूरी जैसी औपचारिकताएं पूरी होना बाकी हैं।

आने वाले समय में यदि इस दिशा में अंतिम निर्णय लिया जाता है, तो देश की शिक्षा व्यवस्था में यह एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा। इससे छात्रों को वैज्ञानिक जानकारी मिलने के साथ-साथ बाल सुरक्षा, लैंगिक संवेदनशीलता और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता को भी नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।

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