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चंद्रशेखर आजाद पर कोर्ट की सख्ती, NBW के साथ संपत्ति कुर्की आदेश

उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इस मामले में चंद्रशेखर आजाद मई 2025 में अदालत में पेश हुए थे और उस समय अपने खिलाफ जारी वारंट को वापस लेने की मांग की थी। इसके बाद मामला आगे की सुनवाई के लिए चलता रहा। ताजा सुनवाई में उनकी अनुपस्थिति को लेकर फिर से अदालत की ओर से कड़ा कदम उठाया गया है। 

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  • October 3, 2026 10:03 am IST, Published 50 minutes ago

गाजियाबाद : उत्तर प्रदेश के नगीना लोकसभा क्षेत्र से सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद से जुड़े करीब आठ साल पुराने मामले में गाजियाबाद की एमपी-एमएलए विशेष अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान उनकी अनुपस्थिति के बाद उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया है। साथ ही रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत ने उनकी संपत्ति कुर्क करने से संबंधित कार्रवाई के आदेश भी दिए हैं। यह मामला वर्ष 2018 में साहिबाबाद थाना क्षेत्र में दर्ज एक कथित मारपीट और गाली-गलौज की घटना से जुड़ा है।

2018 की शादी में विवाद से जुड़ा है मामला

मामला साहिबाबाद क्षेत्र के वृंदावन गार्डन में आयोजित एक शादी समारोह का बताया जा रहा है। शिकायतकर्ता धर्मेंद्र कुमार के मुताबिक, वह वर्ष 2018 में शादी समारोह में शामिल होने पहुंचे थे। इसी दौरान चंद्रशेखर आजाद भी अपने कुछ समर्थकों के साथ वहां मौजूद थे।

शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों के अनुसार, समारोह में मौजूद कुछ लोगों के पास हथियार होने को लेकर धर्मेंद्र कुमार ने सवाल किया था। इसके बाद कथित तौर पर उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट की गई। शिकायत में चंद्रशेखर आजाद के अलावा कुछ अन्य लोगों के नाम भी सामने आए थे। शिकायतकर्ता पक्ष ने घटना के दौरान धमकी दिए जाने का आरोप भी लगाया था।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये बातें शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप हैं। मामले में अंतिम दोषसिद्धि या आरोपों की न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।

कोर्ट में पेशी को लेकर हुई कार्रवाई

ताजा घटनाक्रम में शिकायतकर्ता के अधिवक्ता भजनलाल गौतम ने अदालत में चंद्रशेखर आजाद की अनुपस्थिति का मुद्दा उठाया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, वादी पक्ष ने अदालत को बताया कि इस मामले में पहले भी वारंट जारी हो चुका था, लेकिन इसके बाद भी आरोपी की ओर से लगातार अदालत में उपस्थिति नहीं हुई।

गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान भी चंद्रशेखर आजाद अदालत में उपस्थित नहीं हुए। इसके बाद विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया। रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि वादी पक्ष ने अदालत से संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत आगे की कार्रवाई की मांग की थी।

संपत्ति कुर्की की कार्रवाई का क्या मतलब है?

इस मामले में अदालत की ओर से संपत्ति कुर्की से संबंधित आदेश भी चर्चा में है। रिपोर्टों के अनुसार, वादी पक्ष ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 82 और 83 के तहत कार्रवाई की मांग की थी। इन प्रावधानों के तहत अदालत द्वारा घोषित व्यक्ति की संपत्ति की कुर्की की प्रक्रिया का प्रावधान रहा है।

हालांकि, संपत्ति कुर्की की प्रक्रिया को लेकर वास्तविक कार्रवाई किस स्तर तक हुई है, यह संबंधित न्यायालय के विस्तृत आदेश और आगे की कानूनी प्रक्रिया से स्पष्ट होगा। इसलिए केवल वारंट जारी होने को संपत्ति की तत्काल जब्ती के समान नहीं माना जाना चाहिए।

क्या होता है गैर-जमानती वारंट?

गैर-जमानती वारंट यानी Non-Bailable Warrant (NBW) अदालत द्वारा जारी किया जाने वाला गिरफ्तारी आदेश है। सामान्य समन या कुछ परिस्थितियों में जारी जमानती वारंट की तुलना में यह अधिक कठोर न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है।

NBW जारी होने के बाद संबंधित व्यक्ति को पुलिस गिरफ्तार कर अदालत के समक्ष पेश कर सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि जिस आपराधिक मामले में वारंट जारी हुआ है, उसमें व्यक्ति दोषी साबित हो गया है। दोष या निर्दोषता का फैसला मुकदमे में प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होता है।

पहले भी अदालत में हुई थी पेशी

उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इस मामले में चंद्रशेखर आजाद मई 2025 में अदालत में पेश हुए थे और उस समय अपने खिलाफ जारी वारंट को वापस लेने की मांग की थी। इसके बाद मामला आगे की सुनवाई के लिए चलता रहा। ताजा सुनवाई में उनकी अनुपस्थिति को लेकर फिर से अदालत की ओर से कड़ा कदम उठाया गया है।

मामले में पुलिस की जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई है। अब न्यायालय में आगे की प्रक्रिया जारी है और संबंधित पक्षों को अपने-अपने कानूनी पक्ष रखने का अवसर मिलेगा।

धाराओं को लेकर रिपोर्टों में असंगति

कुछ मीडिया रिपोर्टों में इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 और 305 का उल्लेख किया गया है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में धाराओं के विवरण को लेकर असंगति दिखाई देती है। इसलिए इस संबंध में मूल एफआईआर और अदालत के प्रमाणित आदेश को ही अंतिम आधार माना जाना उचित होगा।

यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि किसी एफआईआर या आरोपपत्र में किसी धारा का उल्लेख होना और अदालत में उन आरोपों का साबित होना अलग-अलग कानूनी चरण हैं।

आगे क्या होगा?

अब इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। गैर-जमानती वारंट के बाद पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्रवाई, अदालत में चंद्रशेखर आजाद की अगली उपस्थिति और वारंट के संबंध में उनके द्वारा मांगी जाने वाली कानूनी राहत पर नजर रहेगी।

वहीं, संपत्ति कुर्की से संबंधित आदेश की प्रक्रिया भी अदालत के निर्देशों और संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार आगे बढ़ेगी। इस पूरे घटनाक्रम का अंतिम प्रभाव न्यायालय की आगे की सुनवाई और आदेशों पर निर्भर करेगा।

चंद्रशेखर आजाद से जुड़ा यह मामला वर्ष 2018 की कथित घटना से शुरू हुआ था और अब करीब आठ साल बाद एक बार फिर अदालत की कार्रवाई के कारण चर्चा में है। मौजूदा स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गाजियाबाद की एमपी-एमएलए विशेष अदालत ने उनकी अनुपस्थिति के बाद गैर-जमानती वारंट जारी किया है और संपत्ति कुर्की से संबंधित कार्रवाई के आदेश की रिपोर्ट सामने आई है। वहीं, 2018 की घटना से जुड़े मूल आरोपों पर अंतिम न्यायिक फैसला अभी बाकी है।

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