नई दिल्ली: प्रधानमंत्री आवास के नजदीक स्थित ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद को खाली करने के नोटिस के बाद विवाद गहरा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित अधिकारियों ने मस्जिद को छह दिनों के भीतर खाली करने को कहा है। करीब 125 से 130 साल पुरानी बताई जा रही इस मस्जिद को लेकर कई राजनीतिक नेताओं और धार्मिक हस्तियों ने चिंता जताई है। उन्होंने केंद्र सरकार से मामले में हस्तक्षेप करने और मस्जिद की कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
रेस कोर्स मस्जिद लोक कल्याण मार्ग के पास स्थित है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह संपत्ति दिल्ली वक्फ बोर्ड के रिकॉर्ड में दर्ज है और वर्ष 1977 से अधिसूचित वक्फ संपत्ति बताई जाती है। इसे ऐतिहासिक धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किए जाने का भी दावा किया गया है। ऐसे में मस्जिद को खाली करने के नोटिस ने इसकी संपत्ति संबंधी स्थिति, संरक्षण और संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, नोटिस जारी करने के पीछे अधिकारियों की ओर से दिए गए विस्तृत कारणों और मस्जिद की वर्तमान कानूनी स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस मामले में केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से तत्काल हस्तक्षेप करने की अपील की है। ओवैसी ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मस्जिद की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार को कदम उठाने चाहिए। उनका तर्क है कि वक्फ संशोधन कानून के प्रावधान भी इस तरह की संपत्तियों की सुरक्षा के सवाल से जुड़े हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली वक्फ बोर्ड का गठन वर्ष 2023 से नहीं हुआ है, जिसके कारण मामले को सुलझाने की जिम्मेदारी पर सवाल उठते हैं। ओवैसी के मुताबिक, बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी इस विषय पर हस्तक्षेप कर सकते थे।
ओवैसी ने इससे पहले रेस कोर्स इलाके के पास स्थित हुजरा कुआं नामक मस्जिद को लेकर भी चिंता जताई थी। उनके अनुसार, वहां नमाज पढ़ने से रोके जाने और मस्जिद को नुकसान पहुंचाने की धमकियों की शिकायत सामने आई है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 1977 के सरकारी गजट में इस धार्मिक स्थल का उल्लेख मिलता है। ओवैसी ने सरकार से इन शिकायतों पर स्थिति स्पष्ट करने और किसी भी कथित गैरकानूनी कार्रवाई को रोकने की मांग की है। हालांकि, इन आरोपों और संबंधित दस्तावेजों की पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर होना जरूरी है।
मस्जिद से पिछले करीब 40 वर्षों से जुड़े बताए जा रहे मोहम्मद हारून ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो में दावा किया कि अधिकारियों ने उन्हें छह दिन के भीतर परिसर खाली करने के लिए कहा है। उनके मुताबिक, मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई है तथा लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (एलएनडीओ) ने इसके सभी प्रवेश द्वार बंद कर दिए हैं। इन दावों को लेकर संबंधित विभागों का आधिकारिक पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण होगा, ताकि कार्रवाई के कारणों और मौजूदा स्थिति को स्पष्ट किया जा सके।
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के कार्यकाल में मुस्लिम धार्मिक स्थलों को लेकर लगातार विवाद सामने आ रहे हैं। अल्वी ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक बहस का विषय बनाया जा रहा है। उनके बयान ने इस विवाद को राजनीतिक रंग भी दे दिया है।
कश्मीर के धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने भी मस्जिद को खाली करने के नोटिस पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यदि कानूनी रूप से दर्ज किसी धार्मिक संपत्ति को संरक्षण नहीं मिल पाता, तो दूसरी मुस्लिम धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठेंगे। उन्होंने वक्फ संशोधनों और धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ने की आशंकाओं का उल्लेख करते हुए संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए।
फिलहाल रेस कोर्स मस्जिद विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पहलू नोटिस का कानूनी आधार, संपत्ति से जुड़े दस्तावेज और संबंधित अधिकारियों का पक्ष है। मामले में आगे की कार्रवाई से यह स्पष्ट होगा कि मस्जिद को खाली कराने का आदेश किन नियमों के तहत दिया गया है और उसके खिलाफ उपलब्ध कानूनी विकल्प क्या हैं। राजनीतिक नेताओं ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है, जबकि स्थानीय स्तर पर मस्जिद से जुड़े लोगों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।