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2029 में एक साथ हो सकते हैं लोकसभा और विधानसभा चुनाव, पीपी चौधरी ने दिए बड़े संकेत

नई दिल्ली/लखनऊ। देश में ‘एक देश-एक चुनाव’ (One Nation One Election) को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। इस विषय पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष एवं भाजपा सांसद पीपी चौधरी ने कहा है कि यदि सभी आवश्यक संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाएं समय पर पूरी हो जाती हैं, तो वर्ष […]

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  • July 15, 2026 9:00 pm IST, Published 57 minutes ago

नई दिल्ली/लखनऊ। देश में ‘एक देश-एक चुनाव’ (One Nation One Election) को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। इस विषय पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष एवं भाजपा सांसद पीपी चौधरी ने कहा है कि यदि सभी आवश्यक संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाएं समय पर पूरी हो जाती हैं, तो वर्ष 2029 में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बार-बार होने वाले चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं और इससे विकास कार्य भी प्रभावित होते हैं।

लखनऊ दौरे के दौरान मीडिया से बातचीत में पीपी चौधरी ने कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों में लोगों से बातचीत के दौरान उन्हें ‘एक देश-एक चुनाव’ के पक्ष में व्यापक समर्थन देखने को मिला है। उनका कहना था कि आम नागरिक चाहते हैं कि चुनावी प्रक्रिया सरल, कम खर्चीली और अधिक प्रभावी बने, ताकि सरकारें बार-बार चुनावी तैयारियों में उलझने के बजाय विकास कार्यों पर अधिक ध्यान दे सकें।

1952 से 1967 तक एक साथ हुए थे चुनाव

पीपी चौधरी ने बताया कि स्वतंत्र भारत में 1952 से 1967 तक लोकसभा और अधिकांश राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित किए जाते थे। बाद में विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने और राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण चुनावी चक्र अलग-अलग हो गया। उन्होंने कहा कि उस समय देश के पास आज जैसी आधुनिक तकनीक या संसाधन नहीं थे, फिर भी एक साथ चुनाव सफलतापूर्वक कराए गए थे। आज इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM), बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था और उन्नत चुनावी प्रबंधन प्रणाली उपलब्ध है, जिससे यह प्रक्रिया और अधिक सुगम हो सकती है।

बार-बार चुनाव से विकास कार्य प्रभावित

जेपीसी अध्यक्ष के अनुसार देश में हर कुछ महीनों में किसी न किसी राज्य में चुनाव होने से प्रशासनिक मशीनरी का बड़ा हिस्सा चुनावी कार्यों में लग जाता है। इसके कारण कई सरकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं की गति प्रभावित होती है। इसके अलावा चुनाव आचार संहिता लागू होने से नई परियोजनाओं की घोषणा और कई प्रशासनिक फैसलों पर भी अस्थायी रोक लग जाती है।

उन्होंने कहा कि यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे तो सरकारी संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, सुरक्षा बलों पर दबाव कम पड़ेगा और चुनाव कराने में होने वाला खर्च भी घटेगा।

जेपीसी कर रही है व्यापक विचार-विमर्श

‘एक देश-एक चुनाव’ से जुड़े विधेयकों की समीक्षा के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति विभिन्न राजनीतिक दलों, संवैधानिक विशेषज्ञों, चुनाव आयोग, विधि विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों के सुझाव ले रही है। समिति का उद्देश्य सभी पक्षों की राय जानने के बाद अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना है।

पीपी चौधरी ने कहा कि समिति पूरी पारदर्शिता के साथ कार्य कर रही है और हर सुझाव पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। उनका मानना है कि इतना बड़ा संवैधानिक बदलाव सभी हितधारकों की सहमति और व्यापक चर्चा के बाद ही लागू होना चाहिए।

समर्थन और विरोध दोनों जारी

‘एक देश-एक चुनाव’ के प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। समर्थकों का कहना है कि इससे चुनावी खर्च में कमी आएगी, शासन व्यवस्था अधिक स्थिर होगी और विकास कार्यों में तेजी आएगी। वहीं कुछ विपक्षी दलों और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में सभी राज्यों के चुनाव एक साथ कराना व्यावहारिक और संवैधानिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस व्यवस्था को लागू करने के लिए संविधान के कई प्रावधानों में संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है। साथ ही राज्यों और केंद्र के बीच व्यापक सहमति भी जरूरी होगी।

2029 को लेकर क्यों बढ़ी चर्चा

पीपी चौधरी के बयान के बाद वर्ष 2029 को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि अभी तक सरकार की ओर से यह आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है कि 2029 में निश्चित रूप से लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे। इसके लिए संसद में विधेयकों के पारित होने, आवश्यक संवैधानिक संशोधनों और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं का पूरा होना आवश्यक होगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सभी आवश्यक प्रक्रियाएं समय पर पूरी होती हैं, तभी इस व्यवस्था को लागू किया जा सकेगा। इसलिए फिलहाल इसे एक संभावित लक्ष्य के रूप में देखा जा रहा है।

देश की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव

यदि भविष्य में ‘एक देश-एक चुनाव’ व्यवस्था लागू होती है तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे बड़े चुनावी सुधारों में से एक माना जाएगा। इससे चुनावी कैलेंडर में बड़ा बदलाव आएगा और केंद्र व राज्यों की सरकारों के कार्यकाल के समन्वय के लिए नई व्यवस्थाएं बनानी पड़ सकती हैं।

फिलहाल संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट और संसद में होने वाली आगे की चर्चा पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि देश वर्ष 2029 तक इस बड़े चुनावी बदलाव की दिशा में कितना आगे बढ़ पाता है।

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