नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) को एक गंभीर मामले में कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि किसी कर्मचारी के साथ संवेदनशील और मानवीय व्यवहार करना हर सरकारी संस्था की जिम्मेदारी है। अदालत ने सेवा के दौरान दृष्टिहीन हुए एक पूर्व CRPF कांस्टेबल को नौकरी से हटाए जाने को अनुचित और कानून के विपरीत बताया। सर्वोच्च न्यायालय ने CRPF की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि बल एक आदर्श नियोक्ता (Model Employer) के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में विफल रहा।
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जवान के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए करीब 1.25 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। इस राशि में बकाया वेतन, ब्याज और मुकदमेबाजी की लागत शामिल है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जवान सेवा निवृत्ति की आयु पार नहीं कर चुका होता, तो उसकी बहाली का आदेश दिया जा सकता था।
क्या है पूरा मामला?
मामला एक CRPF कांस्टेबल का है, जो चालक (Driver Constable) के पद पर तैनात था। ड्यूटी के दौरान एक दुर्घटना में उसकी आंखों की रोशनी चली गई और वह स्थायी रूप से दृष्टिहीन हो गया। इसके बाद CRPF ने उसे किसी वैकल्पिक पद पर समायोजित करने के बजाय चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित कर सेवा से हटा दिया।
पूर्व जवान ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी। उनका तर्क था कि दुर्घटना ड्यूटी के दौरान हुई थी और सरकार की दिव्यांगजन हितैषी नीतियों के अनुसार उन्हें किसी अन्य उपयुक्त पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए था। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी के सेवा के दौरान दिव्यांग होने पर उसे नौकरी से हटाना न केवल असंवेदनशील है बल्कि यह समानता और गरिमा के संवैधानिक सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
अदालत ने कहा कि सरकारी संस्थाओं और सुरक्षा बलों को दिव्यांग कर्मचारियों के पुनर्वास के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। यदि कोई कर्मचारी अपनी मूल जिम्मेदारी निभाने में सक्षम नहीं रह जाता है, तो उसे उसकी क्षमता के अनुरूप वैकल्पिक कार्य दिया जाना चाहिए।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि CRPF जैसे प्रतिष्ठित बल से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करे, न कि उन्हें कठिन परिस्थिति में अकेला छोड़ दे।
‘आदर्श नियोक्ता’ बनने में विफल रही CRPF
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि CRPF एक “Model Employer” की भूमिका निभाने में असफल रही। अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी के साथ केवल नियमों के आधार पर नहीं बल्कि संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण से भी व्यवहार किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी नियोक्ता से निजी संस्थानों की तुलना में अधिक जिम्मेदार और न्यायपूर्ण आचरण की अपेक्षा की जाती है। ऐसे मामलों में कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
1.25 करोड़ रुपये मुआवजे का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व कांस्टेबल को लगभग 1.25 करोड़ रुपये देने का निर्देश दिया। इस राशि में कई वर्षों का बकाया वेतन, उस पर ब्याज और मुकदमेबाजी का खर्च शामिल किया गया है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि संबंधित कर्मचारी अब सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुके हैं, इसलिए उनकी सेवा में बहाली का आदेश देना व्यावहारिक नहीं होगा। इसी कारण अदालत ने आर्थिक मुआवजा देने का फैसला सुनाया।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन
इस मामले में पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारी की सेवा में बहाली का निर्देश दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि संबंधित कर्मचारी अब सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुके हैं। इसलिए बहाली के आदेश में संशोधन करते हुए उसकी जगह पर्याप्त आर्थिक मुआवजा देने का आदेश पारित किया गया।
दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों पर अहम फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी सेवा के दौरान दुर्घटना का शिकार होकर दिव्यांग हो जाता है तो उसे नौकरी से हटाना अंतिम विकल्प नहीं हो सकता।
सरकारी विभागों और सुरक्षा बलों को पहले यह देखना होगा कि कर्मचारी को उसकी क्षमता के अनुसार किसी अन्य पद पर समायोजित किया जा सकता है या नहीं। ऐसा करना संविधान और दिव्यांगजन अधिकार कानून की भावना के अनुरूप भी है।
भविष्य के मामलों पर पड़ेगा असर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का प्रभाव भविष्य में ऐसे कई मामलों पर पड़ सकता है, जहां सरकारी कर्मचारियों को दिव्यांग होने के बाद सेवा से हटाया गया है। यह निर्णय सरकारी विभागों को अपनी मानव संसाधन नीतियों की समीक्षा करने और दिव्यांग कर्मचारियों के प्रति अधिक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला केवल एक कर्मचारी को न्याय दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी संस्थाओं को यह याद दिलाता है कि कर्मचारी केवल कार्यबल नहीं बल्कि मानव संसाधन हैं, जिनके सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करना उनकी जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सरकारी संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि सेवा के दौरान घायल या दिव्यांग हुए कर्मचारियों के साथ संवेदनशील और न्यायपूर्ण व्यवहार किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को केवल उसकी शारीरिक अक्षमता के आधार पर नौकरी से हटाना उचित नहीं है, बल्कि उसे वैकल्पिक अवसर प्रदान करना नियोक्ता का दायित्व है। यह निर्णय दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण न्यायिक फैसला माना जा रहा है।