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OTT और AI के दौर में भी नहीं घटेगी फिल्म महोत्सवों की चमक, ‘फर्जी फेस्टिवल्स’ पर सख्ती की उठी मांग

मुंबई: मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (MIFF) 2026 के अंतिम ओपन फोरम में सिनेमा के जानकारो ने एक स्वर में कहा कि तकनीक, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और बदलती दर्शक आदतों के बावजूद फिल्म महोत्सवों की प्रासंगिकता बनी रहेगी। उन्होंने माना कि डिजिटल क्रांति ने सिनेमा तक पहुंच आसान बनाई है, लेकिन फिल्म फेस्टिवल आज भी खोज, सीखने, संवाद […]

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  • June 21, 2026 2:01 pm IST, Published 1 hour ago

मुंबई: मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (MIFF) 2026 के अंतिम ओपन फोरम में सिनेमा के जानकारो ने एक स्वर में कहा कि तकनीक, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और बदलती दर्शक आदतों के बावजूद फिल्म महोत्सवों की प्रासंगिकता बनी रहेगी। उन्होंने माना कि डिजिटल क्रांति ने सिनेमा तक पहुंच आसान बनाई है, लेकिन फिल्म फेस्टिवल आज भी खोज, सीखने, संवाद और सामूहिक अनुभव का अनूठा मंच हैं।

‘चेंजिंग टेक्नोलॉजीज, चेंजिंग ऑडिएंस: आर फिल्म फेस्टिवल्स इन ट्रांजिशन’ विषय पर आयोजित चर्चा में बेंगलुरु अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के संस्थापक सदस्य एवं पूर्व आर्टिस्टिक डायरेक्टर विद्याशंकर एन., इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो. (डॉ.) के.जी. सुरेश, फिल्म समीक्षक एवं महोत्सव सलाहकार प्रेमेंद्र मजूमदार तथा पुणे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (पीआईएफएफ) की प्रमुख सदस्य अदिति अक्कलकोटकर ने अपने विचार साझा किए। सत्र का संचालन आईडीपीए के अध्यक्ष एवं फिल्म निर्माता संस्कार देसाई ने किया।

विद्याशंकर एन. ने कहा कि 2000 के दशक की डिजिटल क्रांति के बाद फिल्म समारोहों का स्वरूप जरूर बदला है, लेकिन उनका मूल उद्देश्य आज भी वही है। उन्होंने कहा, “फिल्म समारोह सिनेमा के वास्तविक अनुभव के लिए होते हैं, केवल जानकारी हासिल करने के लिए नहीं।” उन्होंने संग्रहालयों का उदाहरण देते हुए कहा कि ऑनलाइन सामग्री की भरमार के बावजूद लोग आज भी ऐसे मंचों की तलाश करते हैं जहां वे संस्कृति और कला को गहराई से महसूस कर सकें। उनके अनुसार युवा दर्शक नई तकनीकों और सिनेमाई प्रयोगों के लिए फिल्म समारोहों में आते हैं, जबकि वरिष्ठ दर्शक नॉस्टैल्जिया और सिनेमा के प्रति अपने जुड़ाव के कारण इन आयोजनों से जुड़े रहते हैं।

प्रो. (डॉ.) के.जी. सुरेश ने कहा कि फिल्म समारोहों का सवाल अब अस्तित्व का नहीं, बल्कि प्रासंगिकता का है। उन्होंने कहा कि फिल्म फेस्टिवल केवल मनोरंजन या उत्सव का मंच नहीं, बल्कि सीखने और समझ विकसित करने का माध्यम भी होने चाहिए। उनके अनुसार तकनीक तभी सार्थक है जब उसके केंद्र में गुणवत्तापूर्ण कंटेंट हो। उन्होंने सिनेमा को शिक्षा और सामाजिक बदलाव का प्रभावशाली माध्यम बताते हुए स्कूलों और विश्वविद्यालयों में फिल्म एप्रिसिएशन को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया।

अदिति अक्कलकोटकर ने कहा कि फिल्म महोत्सव दर्शकों के सामने ऐसी दुनिया खोलते हैं, जिनसे उनका सामान्यतः परिचय नहीं हो पाता। उन्होंने बताया कि पुणे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में छात्रों की सक्रिय भागीदारी न केवल आयोजन को ऊर्जा देती है, बल्कि युवाओं को विविध संस्कृतियों और वैश्विक सिनेमा से जोड़ने का अवसर भी प्रदान करती है। उनके अनुसार फिल्म फेस्टिवल फिल्मों के प्रदर्शन से आगे बढ़कर संवाद, नेटवर्किंग और विचारों के आदान-प्रदान का मंच बन चुके हैं।

वहीं फिल्म समीक्षक प्रेमेंद्र मजूमदार ने डिजिटल युग में तेजी से बढ़ रहे तथाकथित ‘फर्जी फिल्म महोत्सवों’ पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कई आयोजन केवल व्यावसायिक लाभ के उद्देश्य से संचालित हो रहे हैं और ‘पे-टू-विन’ मॉडल के तहत फिल्म निर्माताओं का शोषण कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों के लिए कोई स्पष्ट नियामक व्यवस्था नहीं है, जिससे फिल्म निर्माताओं को नुकसान उठाना पड़ता है। मजूमदार ने सरकार से ऐसे फर्जी महोत्सवों पर निगरानी और नियमन को सख्त करने की मांग की।

चर्चा के दौरान फिल्म सोसाइटियों और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका पर भी जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि जागरूक और संवेदनशील दर्शक वर्ग तैयार करने के लिए फिल्म अध्ययन, फिल्म क्लबों और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना आवश्यक है। सत्र के अंत में विशेषज्ञों की आम राय रही कि चाहे तकनीक कितनी भी विकसित हो जाए और दर्शकों की आदतें कितनी भी बदल जाएं, फिल्म महोत्सव सिनेमा, संस्कृति और रचनात्मक संवाद के ऐसे मंच बने रहेंगे जिनकी जगह कोई डिजिटल माध्यम पूरी तरह नहीं ले सकता।

 

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