गुजरात, सूरत : सोशल मीडिया पर वायरल खबर ने दवा की गुणवत्ता और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वायरल पोस्ट में गुजरात के सूरत में बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाले एक कथित लीवर टॉनिक को लेकर दावा किया गया है कि उसे घोड़े के लीवर से संबंधित उत्पाद के रूप में बेचा जा रहा है। हालांकि, केवल वायरल पोस्ट के आधार पर इस दावे की सत्यता, उत्पाद की वास्तविक संरचना या संबंधित कंपनी की भूमिका की पुष्टि नहीं की जा सकती। ऐसे मामले में आधिकारिक जांच और दवा के लेबल की प्रमाणिक जानकारी बेहद महत्वपूर्ण है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, गुजरात के सूरत शहर में स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) और खाद्य एवं औषधि नियंत्रण विभाग की टीम ने संयुक्त कार्रवाई की। जांच के दौरान गोपीपुरा क्षेत्र में मोमनावाद रोड स्थित शांतिनाथ मेडिकल स्टोर पर छापेमारी किए जाने की जानकारी सामने आई। पुलिस ने दुकान संचालक मोहम्मद साजिद इब्राहिम मुल्ला को गिरफ्तार किया। उन पर पशुओं के लिए तैयार किए गए लिक्विड सप्लीमेंट को बच्चों की दवा बताकर बेचने का आरोप है।
यह मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि बच्चों को दी जाने वाली दवाओं और स्वास्थ्य उत्पादों के मामले में उनकी सही पहचान, संरचना और उपयोग की पुष्टि बेहद जरूरी होती है। यदि किसी पशु-उपयोग उत्पाद को बिना अनुमति मानव उपयोग के लिए बेचा जाता है, तो इससे उपभोक्ताओं को गुमराह करने के साथ स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी पैदा हो सकते हैं।
रिपोर्टों में दी गई जानकारी के अनुसार, जांच एजेंसियों को कथित तौर पर पता चला कि पशुओं के लिए बनाए गए ‘Liv.52 Protec Liquid Animal Feed Supplement’ को बड़े पैक से निकालकर छोटी बोतलों में भरा जाता था। इसके बाद उन बोतलों पर मानव उपयोग के लिए उपलब्ध ‘Liv.52 Drops’ से मिलते-जुलते लेबल लगाए जाने का आरोप है। इस तरह उत्पाद को बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाले टॉनिक के रूप में बेचने की आशंका जताई गई।
यहां ध्यान देना जरूरी है कि एक जैसे या मिलते-जुलते नाम वाले उत्पादों का उपयोग, संरचना और नियामकीय स्थिति अलग-अलग हो सकती है। किसी उत्पाद का नाम देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह बच्चों के लिए सुरक्षित है। उत्पाद की वास्तविक पैकेजिंग, निर्माता का विवरण, बैच नंबर और उपयोग संबंधी निर्देशों की जांच आवश्यक होती है।
मीडिया रिपोर्टों में पुलिस के हवाले से बताया गया है कि आरोपी ने कथित तौर पर लगभग एक वर्ष के दौरान करीब एक हजार छोटी बोतलें तैयार कर बेची थीं। यदि जांच में यह जानकारी प्रमाणित होती है, तो यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि इन बोतलों को किन ग्राहकों तक पहुंचाया गया और कितने परिवारों ने इन्हें बच्चों के लिए खरीदा। हालांकि, इस समय संभावित प्रभावित बच्चों की वास्तविक संख्या और उनकी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
जांच एजेंसियों के सामने इस कथित कारोबार की पूरी श्रृंखला का पता लगाना भी महत्वपूर्ण है। इसमें उत्पाद की खरीद, छोटी बोतलों में भरने की प्रक्रिया, लेबल तैयार कराने, बिक्री के रिकॉर्ड और संभावित आपूर्ति नेटवर्क की पड़ताल शामिल हो सकती है।
इस मामले में आर्थिक लाभ का पहलू भी जांच के दायरे में है। प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, पशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाले सप्लीमेंट के एक लीटर पैक की कीमत लगभग 330 रुपये बताई गई, जबकि मानव उपयोग वाले 60 मिलीलीटर Liv.52 Drops की कीमत 160 रुपये बताई गई है। आरोप है कि बड़े पैक से छोटी बोतलें तैयार करके उन्हें मानव उपयोग वाले उत्पाद के नाम पर बेचा जाता था।
हालांकि, इन कीमतों के आधार पर कुल मुनाफे का अंतिम आकलन करना संभव नहीं है। इसके लिए बिक्री की वास्तविक कीमत, तैयार की गई बोतलों की संख्या, खरीद लागत और जब्त सामग्री से संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड की पुष्टि जरूरी होगी। पुलिस जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित कारोबार से कितनी कमाई हुई और इसमें अन्य लोगों की कोई भूमिका थी या नहीं।
बच्चों का शरीर कई मामलों में वयस्कों से अलग तरीके से दवाओं और अन्य पदार्थों पर प्रतिक्रिया करता है। इसलिए किसी भी दवा या स्वास्थ्य उत्पाद का इस्तेमाल उसकी निर्धारित श्रेणी, उम्र के अनुसार निर्देश और चिकित्सकीय सलाह के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
पशुओं के लिए बनाया गया सप्लीमेंट केवल इसलिए बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं माना जा सकता कि उसका उपयोग भी लिवर से संबंधित जरूरतों के लिए होता है। दोनों उत्पादों की संरचना, मात्रा, गुणवत्ता मानक और उपयोग की मंजूरी अलग हो सकती है। बिना चिकित्सकीय पुष्टि के किसी भी पशु-उपयोग उत्पाद को बच्चों को देना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
इस मामले में यह भी जरूरी है कि किसी संभावित स्वास्थ्य प्रभाव के बारे में बिना मेडिकल जांच के दावा न किया जाए। यदि किसी बच्चे को संदिग्ध बोतल से उत्पाद दिया गया है, तो अभिभावकों को बोतल और पैकेजिंग सुरक्षित रखनी चाहिए तथा बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। बच्चे में कोई असामान्य लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
इस घटना से दवाओं और स्वास्थ्य उत्पादों की खरीद के दौरान सावधानी बरतने की जरूरत फिर सामने आती है। अभिभावकों को कुछ महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना चाहिए।
* सीलबंद पैकिंग देखें: बोतल की सील टूटी हुई हो या पैकिंग दोबारा भरी हुई दिखाई दे, तो उत्पाद का इस्तेमाल न करें।
* लेबल की जांच करें: उत्पाद का पूरा नाम, निर्माता, बैच नंबर, समाप्ति तिथि और उपयोग संबंधी निर्देश पढ़ें।
* बिना सलाह दवा न दें: बच्चों को टॉनिक, सप्लीमेंट या अन्य दवा देने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।
* बिल जरूर लें: अधिकृत मेडिकल स्टोर से खरीदारी करें और भुगतान की रसीद सुरक्षित रखें।
* संदेह होने पर शिकायत करें: संदिग्ध उत्पाद की जानकारी संबंधित राज्य के औषधि नियंत्रण विभाग को दें।
इन सावधानियों का उद्देश्य केवल किसी एक घटना से बचना नहीं, बल्कि दवा खरीदने और इस्तेमाल करने की सुरक्षित आदत विकसित करना है।
सूरत के इस मामले में आगे की जांच के दौरान कई सवाल महत्वपूर्ण होंगे। कथित तौर पर तैयार की गई बोतलों में कौन-सा उत्पाद था? क्या उनकी संरचना की प्रयोगशाला जांच की गई? कितने उत्पाद जब्त हुए? क्या उन्हें खरीदने वाले ग्राहकों की पहचान की गई? क्या किसी बच्चे को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हुई? और क्या इस कथित गतिविधि में मेडिकल स्टोर के अलावा कोई अन्य व्यक्ति भी शामिल था?
इन सवालों के जवाब जांच एजेंसियों और संबंधित विभाग की आधिकारिक जानकारी से ही स्पष्ट हो सकेंगे। मीडिया रिपोर्टों में गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है, लेकिन गिरफ्तारी अपने आप में आरोपों को अदालत में सिद्ध नहीं करती। मामले के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होना आवश्यक है।
दवा की पहचान और बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि
गुजरात के सूरत में पशुओं के लिए बने लिवर सप्लीमेंट को बच्चों की दवा बताकर बेचने के कथित मामले ने दवा की गुणवत्ता, सही लेबलिंग और मेडिकल स्टोर की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए हैं। बच्चों की दवाओं के मामले में किसी भी तरह की लापरवाही गंभीर चिंता का विषय है।
अब इस मामले में जांच के निष्कर्ष, जब्त उत्पादों की जांच और संभावित ग्राहकों तक पहुंचने से जुड़ी जानकारी महत्वपूर्ण होगी। अभिभावकों को घबराने के बजाय सतर्क रहना चाहिए और बच्चों को कोई भी दवा केवल विश्वसनीय स्रोत तथा चिकित्सकीय सलाह के आधार पर देनी चाहिए।