नई दिल्ली: प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव पर जल्द ही संसद में चर्चा होने की संभावना है। इस प्रस्ताव की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) अपनी रिपोर्ट संसद के मानसून सत्र से पहले स्वीकार कर सकती है। इसके बाद विधेयक को संसद में चर्चा और आगे की प्रक्रिया के लिए पेश किए जाने की संभावना है।
प्रस्तावित संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 का सबसे चर्चित प्रावधान यह है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री ऐसे अपराध में गिरफ्तार होता है, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, और वह लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, तो उसका पद स्वतः समाप्त हो सकता है। इस प्रावधान को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक स्तर पर व्यापक बहस छिड़ी हुई है।
सूत्रों के अनुसार, जेपीसी अपनी रिपोर्ट में इस मूल प्रावधान को बरकरार रख सकती है। हालांकि, समिति कानून के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की भी सिफारिश कर सकती है। इनमें यह तय करने जैसे सुझाव शामिल हो सकते हैं कि किन प्रकार के गंभीर अपराधों में ही यह प्रावधान लागू होगा, ताकि राजनीतिक प्रतिशोध या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई की आशंका कम हो।
विधेयक को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वर्ष 2025 में संसद में पेश किया था। इसके परीक्षण के लिए भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता में 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया। समिति में विभिन्न दलों के सांसद शामिल हैं, हालांकि कांग्रेस समेत विपक्षी गठबंधन के कई सदस्यों ने इसकी कार्यवाही का बहिष्कार किया था। विपक्ष का कहना था कि उनकी आपत्तियों पर पर्याप्त विचार नहीं किया जाएगा।
विपक्षी दलों का तर्क है कि केवल गिरफ्तारी या हिरासत के आधार पर किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को पद से हटाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। उनका मानना है कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का अधिकार न्यायालय के अंतिम निर्णय के बाद ही होना चाहिए, जबकि प्रस्तावित व्यवस्था दोष सिद्ध होने से पहले ही दंडात्मक प्रभाव डाल सकती है।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ गठबंधन का पक्ष है कि 30 दिन की लगातार हिरासत कोई सामान्य स्थिति नहीं होती और इस अवधि में संबंधित व्यक्ति को न्यायालय से जमानत लेने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं। ऐसे में यह व्यवस्था जवाबदेही और सार्वजनिक जीवन में नैतिक मानकों को मजबूत करने की दिशा में एक कदम मानी जा सकती है।
सूत्रों के मुताबिक, समिति अपनी रिपोर्ट में कानून के दायरे को सीमित करने और केवल गंभीर प्रकृति के अपराधों तक इसे लागू करने की सिफारिश कर सकती है। इससे यह सुनिश्चित करने का प्रयास होगा कि कानून का उपयोग केवल विशेष परिस्थितियों में ही किया जाए।
जेपीसी की रिपोर्ट आने के बाद यह मुद्दा संसद के आगामी मानसून सत्र में प्रमुख राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बन सकता है। यदि विधेयक पारित होता है तो यह जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही से जुड़े कानूनों में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा।