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कैदियों की जिंदगी पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर, राज्यों से मांगी 3 महीने में नई रिहाई नीति

नई दिल्ली: देश की जेलों में बंद बुजुर्ग, गंभीर रूप से बीमार और शारीरिक रूप से अक्षम कैदियों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। सर्वोच्च अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर ऐसी नीति तैयार करने का आदेश दिया है, जिसके तहत मानवीय आधार […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • July 16, 2026 2:39 pm IST, Published 59 minutes ago

नई दिल्ली: देश की जेलों में बंद बुजुर्ग, गंभीर रूप से बीमार और शारीरिक रूप से अक्षम कैदियों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। सर्वोच्च अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर ऐसी नीति तैयार करने का आदेश दिया है, जिसके तहत मानवीय आधार पर पात्र कैदियों की समयपूर्व रिहाई पर विचार किया जा सके।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह निर्देश एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए। अदालत ने कहा कि 70 वर्ष या उससे अधिक आयु के गंभीर रूप से बीमार, असाध्य रोगों से पीड़ित अथवा शारीरिक रूप से अक्षम कैदियों के मामलों में संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को केवल प्रशासनिक देरी के कारण अपने जीवन के अंतिम दिन जेल में बिताने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रत्येक राज्य अपनी नीति राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) के परामर्श से तैयार करे, ताकि पात्र कैदियों की पहचान और उनकी रिहाई की प्रक्रिया पारदर्शी, प्रभावी और समयबद्ध तरीके से पूरी की जा सके। अदालत ने यह भी कहा कि नीति में पात्रता के स्पष्ट मानदंड तय किए जाएं और आवेदन से लेकर अंतिम निर्णय तक की पूरी प्रक्रिया निश्चित समयसीमा के भीतर पूरी हो।

पीठ ने राज्यों से कहा कि असाध्य बीमारी (टर्मिनल इलनेस) की एक समान परिभाषा भी नीति का हिस्सा बनाई जाए। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (UNODC) की गाइडलाइन को संदर्भ के रूप में अपनाया जा सकता है। साथ ही, कैदियों की स्वास्थ्य स्थिति का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड गठित करने के भी निर्देश दिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रिहाई से जुड़े सभी निर्णय लिखित कारणों के साथ लिए जाएं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उनकी न्यायिक समीक्षा संभव हो सके। अदालत का मानना है कि पारदर्शिता और जवाबदेही इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा होनी चाहिए।

इसके अलावा, अदालत ने अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी (UTRC) को समय-समय पर ऐसे कैदियों के मामलों की समीक्षा करने का निर्देश दिया है, जो अधिक उम्र, गंभीर बीमारी या शारीरिक अक्षमता जैसी परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। समिति आवश्यकता पड़ने पर जमानत, पैरोल या सजा में राहत की सिफारिश भी कर सकेगी।

डिजिटल निगरानी को मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि समयपूर्व रिहाई की पूरी प्रक्रिया को ई-प्रिज़न्स (E-Prisons) पोर्टल से जोड़ा जाए। इस पोर्टल पर आवेदन, मेडिकल रिपोर्ट, जेल प्रशासन की रिपोर्ट, मेडिकल बोर्ड की राय और अंतिम आदेश सहित सभी दस्तावेज दर्ज किए जाएंगे। अदालत ने केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय, गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) को राज्यों को आवश्यक तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 19 जनवरी 2027 तय की है। उस दिन अदालत राज्यों द्वारा तैयार की गई नीतियों और अपने निर्देशों के पालन की समीक्षा करेगी। इस फैसले को जेल सुधार और मानवीय अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

 

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