हमारा समाज बड़ा उदार है। यहाँ लोग स्वयं चाहे जीवन की गाड़ी धक्के से चला रहे हों, पर दूसरों को जीवन-प्रबंधन पर ऐसा भाषण देंगे मानो ब्रह्मा जी ने सृष्टि-रचना से पहले इन्हीं से सलाह ली हो। सच ही कहा गया है “पर उपदेश कुशल बहुतेरे।”
अर्थात् अपने जीवन का हिसाब भले ही अस्त-व्यस्त हो, पर दूसरों को ज्ञान बाँटने में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।
हमारे आसपास ऐसे महापुरुषों की कोई कमी नहीं। जो व्यक्ति स्वयं समय पर नहीं उठता, वही प्रातःकालीन अनुशासन पर आधे घंटे का प्रवचन देगा। जिसका अपना घर कलह का अखाड़ा बना हो, वही पारिवारिक सौहार्द पर बड़ी गंभीर मुद्रा में सलाह देगा। जो अपनी सेहत को वर्षों से पान, गुटखा, तम्बाकू और क्रोध की भट्ठी में झोंक चुका हो, वही दूसरों से कहेगा, “भाई साहब, स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है।”
आजकल उपदेश देना एक प्रकार का सामाजिक उद्योग बन चुका है। इसके लिए न योग्यता चाहिए, न अनुभव, न आत्मानुशासन। केवल चेहरा गंभीर होना चाहिए, आवाज़ में कृत्रिम करुणा होनी चाहिए, और वाक्य की शुरुआत “देखिए, मेरी मानिए तो…” से होनी चाहिए। फिर सामने वाला चाहे सुने या मन ही मन सिर पीटे, उपदेशक महोदय को इससे क्या?
सबसे रोचक दृश्य तब होता है जब असफलता का पहाड़ ढोता व्यक्ति सफलता के सूत्र बाँटता है। जिसने अपने जीवन में दो रिश्ते, तीन व्यवसाय और चार अवसर अपने ही स्वभाव से नष्ट कर दिए हों, वही युवाओं को समझाता है, “जीवन में धैर्य रखो, संतुलन रखो, निर्णय सोच-समझकर लो।” लगता है जैसे अनुभव नहीं, दुर्घटनाएँ बोल रही हों।
राजनीति में देखिए। जो नेता स्वयं सिद्धांतों को मौसम की तरह बदलते हैं, वही जनता को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। चुनाव के समय विनम्रता की प्रतिमा बन जाते हैं, और जीत के बाद दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। पर भाषणों में राष्ट्रहित, जनसेवा, त्याग, समर्पण, ईमानदारी सब ऐसे झरते हैं जैसे गंगा यहीं से फूट रही हो। जनता भी कम कृपालु नहीं; हर बार नया उपदेश सुनती है, पुराना भूल जाती है।
परिवारों में भी यह कला खूब विकसित है। माता-पिता कभी-कभी बच्चों से कहते हैं, “मोबाइल कम चलाया करो”, और यह उपदेश देते समय स्वयं तीन व्हाट्सऐप ग्रुप, दो फेसबुक पोस्ट और एक फॉरवर्ड में व्यस्त होते हैं। बच्चे भी अब समझदार हैं; वे जानते हैं कि घर में उपदेश एक ऐसी वस्तु है जिसका उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता है, पर उपभोग कोई नहीं करता।
धर्म और समाज के क्षेत्र में तो यह परंपरा और भी समृद्ध है। जो व्यक्ति विनम्रता पर बोलते-बोलते स्वयं अहंकार से फूला जाए, जो त्याग का महत्व समझाते हुए मंच, माला, फोटो और सम्मान-पत्र की गिनती करता रहे, जो सादगी का उपदेश देते-देते पाँच विशेष व्यवस्थाएँ माँग ले, वहाँ समझ लेना चाहिए कि “पर उपदेश” अब साधना नहीं, प्रदर्शन बन चुका है।
सोशल मीडिया ने तो इस कला को स्वर्णयुग दे दिया है। वहाँ हर दूसरा व्यक्ति जीवन-गुरु है। सुबह प्रेरणादायक सुविचार, दोपहर में क्रोध से भरी टिप्पणी, शाम को किसी की निंदा, और रात को आत्मिक शांति पर पोस्ट। ऐसा बहुरंगी चरित्र शायद पुराने युगों में दुर्लभ रहा होगा। अब व्यक्ति अपने आचरण से नहीं, पोस्टरनुमा वाक्यों से महान बनना चाहता है।
विडम्बना यह है कि उपदेश देना आसान है, आत्मसुधार कठिन। दूसरों को आईना दिखाना सरल है, स्वयं दर्पण के सामने खड़ा होना कठिन। इसलिए हम सबने सुविधाजनक मार्ग चुन लिया है, अपने दोषों पर पर्दा डालो और दूसरों के दोषों पर प्रकाश डालो। यही आधुनिक सामाजिक बुद्धिमत्ता है।
वस्तुतः समस्या उपदेश में नहीं, बिना आचरण के उपदेश में है। जो बात जीवन में उतरी न हो, वह वाणी में आते ही खोखली हो जाती है। शब्दों की चमक कुछ पल को प्रभावित कर सकती है, पर व्यवहार की सच्चाई ही स्थायी प्रभाव छोड़ती है। समाज को उपदेशकों से अधिक उदाहरणों की आवश्यकता है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम बोलने से पहले ठहरें और देखें, जो कह रहे हैं, क्या वह हमारे जीवन में भी दिखाई देता है? यदि नहीं, तो थोड़ा मौन शायद अधिक उपयोगी होगा। क्योंकि संसार को ज्ञान देने वाले बहुत हैं, पर स्वयं पर ज्ञान लागू करने वाले कम।
अंततः यही कहना उचित होगा कि
हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यह नहीं कि लोग गलतियाँ करते हैं; सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि वे अपनी गलतियों के बीच खड़े होकर दूसरों को आदर्श जीवन जीने की शिक्षा देते हैं। और इसलिए यह पंक्ति आज भी उतनी ही सत्य, उतनी ही तीखी, और उतनी ही प्रासंगिक है,
“पर उपदेश कुशल बहुतेरे।
(डाॅ. कीर्ति शर्मा )