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मिट्टी के बर्तन का दही क्या स्टील से 100 गुना बेहतर होता है?

मिट्टी के बर्तन का दही : मिट्टी के बर्तन में जमाया गया दही स्टील या प्लास्टिक के बर्तन में जमाए दही से 100 गुना ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक होता है। फैक्ट चेक: दावे का यह “100 गुना” वाला हिस्सा वैज्ञानिक प्रमाणों से साबित नहीं है। हालांकि मिट्टी के बर्तन में दही जमाने से बनावट, पानी की मात्रा, […]

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  • September 15, 2026 9:51 am IST, Published 12 seconds ago

मिट्टी के बर्तन का दही : मिट्टी के बर्तन में जमाया गया दही स्टील या प्लास्टिक के बर्तन में जमाए दही से 100 गुना ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक होता है।

फैक्ट चेक: दावे का यह “100 गुना” वाला हिस्सा वैज्ञानिक प्रमाणों से साबित नहीं है। हालांकि मिट्टी के बर्तन में दही जमाने से बनावट, पानी की मात्रा, ठंडक और पारंपरिक स्वाद में कुछ अंतर आ सकता है।

सोशल मीडिया पर इन दिनों मिट्टी के बर्तन में जमाए गए दही को लेकर एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है। पोस्ट में दावा किया गया है कि मिट्टी के बर्तन में जमा दही स्टील या प्लास्टिक के बर्तन में रखे दही की तुलना में “100 गुना बेहतर” होता है। वायरल पोस्ट में इसके पीछे मिट्टी के क्षारीय (Alkaline) होने, दही की अम्लीय प्रकृति को संतुलित करने और मिट्टी के सूक्ष्म छिद्रों द्वारा अतिरिक्त पानी सोखने जैसी वजहें बताई गई हैं।

दही से जुड़े कुछ वैज्ञानिक तथ्य जरूर इस दावे को दिलचस्प बनाते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पोस्ट में किए गए सभी दावों को वैज्ञानिक तथ्य मान लेना सही नहीं होगा।

दही जमने के पीछे असली विज्ञान क्या है?

दही मूल रूप से दूध के नियंत्रित किण्वन (Fermentation) से बनता है। इसमें विशिष्ट बैक्टीरिया दूध में मौजूद लैक्टोज को किण्वित करके लैक्टिक एसिड बनाते हैं। इससे दूध की अम्लता बढ़ती है और उसकी संरचना बदलकर वह गाढ़े दही में बदल जाता है।

वैज्ञानिक साहित्य में दही के प्रमुख स्टार्टर माइक्रोऑर्गेनिज्म के रूप में Streptococcus thermophilus और Lactobacillus delbrueckii subsp. bulgaricus का उल्लेख मिलता है। दही में मौजूद माइक्रोबियल कल्चर उसकी गुणवत्ता, स्वाद और अम्लता को प्रभावित करते हैं।

इसलिए दही की गुणवत्ता का सबसे महत्वपूर्ण आधार दूध, स्टार्टर कल्चर, तापमान, समय और स्वच्छता है। केवल बर्तन बदल देने से दही 100 गुना ज्यादा पौष्टिक या स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है, ऐसा प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

क्या मिट्टी का बर्तन दही को ज्यादा गाढ़ा बनाता है?

यह दावा कुछ हद तक व्यावहारिक अनुभव पर आधारित हो सकता है। पारंपरिक मिट्टी के बर्तन छिद्रयुक्त होते हैं। इन सूक्ष्म छिद्रों के कारण नमी और तापमान के व्यवहार में अंतर आ सकता है। इसके अलावा मिट्टी का बर्तन दही को एक अलग बनावट और पारंपरिक स्वाद दे सकता है।

दही में पानी अलग होने यानी syneresis की मात्रा कई कारकों पर निर्भर करती है। दूध की संरचना, तापमान, स्टार्टर कल्चर और भंडारण की स्थिति दही की बनावट को प्रभावित करती है। वैज्ञानिक अध्ययनों में दही की firmness, water-holding capacity, acidity और microbial viability में अलग-अलग परिस्थितियों के कारण बदलाव दर्ज किए गए हैं।

इसलिए यह कहना ज्यादा उचित है कि मिट्टी के बर्तन में दही कुछ परिस्थितियों में अधिक गाढ़ा और पारंपरिक स्वाद वाला महसूस हो सकता है, लेकिन इसे हर स्थिति में वैज्ञानिक रूप से श्रेष्ठ साबित नहीं किया गया है।

क्या मिट्टी की क्षारीय प्रकृति दही की अम्लता को बैलेंस करती है?

वायरल पोस्ट का सबसे बड़ा वैज्ञानिक दावा यही है। पोस्ट में कहा गया है कि मिट्टी क्षारीय होती है और इसलिए वह दही की अम्लता को “बैलेंस” कर देती है।

यह बात इतनी सरल नहीं है। दही का खट्टापन मुख्य रूप से लैक्टिक एसिड और किण्वन प्रक्रिया से जुड़ा होता है। दही जमने के दौरान pH में बदलाव होता है और अम्लता बढ़ती है।

मिट्टी के बर्तन की रासायनिक संरचना भी हर जगह समान नहीं होती। अलग-अलग प्रकार की मिट्टी और बर्तनों की निर्माण प्रक्रिया के कारण उनके गुण बदल सकते हैं। इसलिए केवल “मिट्टी क्षारीय है, इसलिए वह दही के एसिड को न्यूट्रलाइज कर देती है” कहना वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त नहीं है।

क्या मिट्टी के बर्तन से दही में ज्यादा प्रोबायोटिक्स बनते हैं?

यह दावा भी सावधानी से समझने की जरूरत है। दही में लाभकारी सूक्ष्मजीव मौजूद हो सकते हैं और कुछ प्रकार के दही प्रोबायोटिक माइक्रोऑर्गेनिज्म के स्रोत हो सकते हैं। लेकिन हर दही को स्वतः “प्रोबायोटिक” कहना सही नहीं है।

NIH के अनुसार, किसी खाद्य पदार्थ में जीवित सूक्ष्मजीव मौजूद होना और उसका वैज्ञानिक रूप से सिद्ध प्रोबायोटिक लाभ होना दो अलग बातें हैं। प्रोबायोटिक प्रभाव विशिष्ट माइक्रोऑर्गेनिज्म, उसकी मात्रा और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

यानी मिट्टी के बर्तन में दही जमाने मात्र से उसमें 100 गुना ज्यादा गुड बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं, ऐसा प्रमाण नहीं है।

फिर मिट्टी के बर्तन में दही जमाने के फायदे क्या हो सकते हैं?

मिट्टी के बर्तन का इस्तेमाल करने के कुछ व्यावहारिक फायदे हो सकते हैं। पारंपरिक रूप से मिट्टी के बर्तन वाष्पीकरण और तापमान के कारण खाद्य पदार्थों को अलग तरह का वातावरण दे सकते हैं। दही अधिक गाढ़ा महसूस हो सकता है और उसमें मिट्टी के बर्तन से जुड़ा पारंपरिक स्वाद भी आ सकता है।

इसके अलावा कई लोगों को मिट्टी के बर्तन में जमा दही का स्वाद और टेक्सचर स्टील के बर्तन की तुलना में बेहतर लगता है। लेकिन यह स्वाद और बनावट का अंतर है, इसे सीधे स्वास्थ्य लाभ का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

वैज्ञानिक समीक्षा में योगर्ट और fermented milk के सेवन से कई संभावित स्वास्थ्य लाभों के संबंध पाए गए हैं, विशेषकर पाचन और कुछ अन्य स्वास्थ्य परिणामों के संदर्भ में। हालांकि प्रभाव अलग-अलग व्यक्ति और दही के प्रकार के अनुसार बदल सकते हैं।

स्वच्छता का रखें विशेष ध्यान

मिट्टी के बर्तन की सबसे बड़ी सावधानी उसकी सफाई और गुणवत्ता है। क्योंकि मिट्टी छिद्रयुक्त होती है, इसलिए उसे ठीक से साफ और सुखाकर इस्तेमाल करना जरूरी है। पुराने, दरार वाले या खराब तरीके से तैयार किए गए बर्तनों में खाद्य स्वच्छता संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।

दही जमाते समय साफ दूध, साफ बर्तन और उचित तापमान का इस्तेमाल ज्यादा महत्वपूर्ण है। तैयार दही को लंबे समय तक कमरे के तापमान पर छोड़ने के बजाय उचित तरीके से ठंडा करके रखना चाहिए।

निष्कर्ष: मिट्टी के बर्तन में दही जमाना परंपरागत और उपयोगी तरीका हो सकता है, और इससे दही की बनावट, पानी की मात्रा, तापमान और स्वाद में अंतर महसूस हो सकता है। लेकिन सोशल मीडिया पर किया जा रहा यह दावा कि मिट्टी के बर्तन का दही स्टील या प्लास्टिक की तुलना में “100 गुना ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक” है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है।

इसी तरह मिट्टी की क्षारीय प्रकृति द्वारा दही के एसिड को न्यूट्रलाइज करने और मिट्टी के छिद्रों के कारण उसमें असाधारण मात्रा में गुड बैक्टीरिया पैदा होने की बात को भी पुख्ता वैज्ञानिक तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।

सही बात यह है कि दही स्वयं एक fermented food है और उसमें मौजूद जीवित संस्कृतियां तथा उसका पोषण स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन दही किस बर्तन में जमाया गया है, उसके आधार पर 100 गुना स्वास्थ्य लाभ का दावा अतिशयोक्तिपूर्ण है।

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