जयपुर : राजस्थान की प्रख्यात लोकगायिका मरु कोकिला सीमा सीमा मिश्रा को उनकी सुमधुर,भावपूर्ण और लोकसंस्कृति से जुड़ी गायकी के कारण राजस्थान के लोगों द्वारा इन्हें प्रेमपूर्वक “राजस्थान की लता” के रूप में संबोधित किया जाता है। यह अपने आप में सबसे बड़ा सम्मान है राजस्थान के सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता पुस्तकों में उन्हें पढ़ाया और बताया जाता है।
राजस्थानी भाषा,संस्कृति,लोकगीत- संगीत के संरक्षण,संवर्धन एवं सृजन के लिए कृत संकल्पित सीमा मिश्रा ने सीमा मिश्रा राजस्थान लोक संगीत कला अकादमी के माध्यम से समय-समय पर राष्ट्रव्यापी प्रतियोगिता तथा प्रशिक्षण शिविर देशभर में अलग-अलग स्थान पर आयोजित कर नवोदित कलाकारों को प्रोत्साहित करने का कार्य निरंतर करती आ रही है,राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए तथा उसे सम्मान प्रदान करने के लिए विगत 25 वर्षों से निरंतर लोगों को प्रेरित करने वाली सीमा मिश्रा अपनी सुरीली आवाज़ से राजस्थानी लोकगीतों और भजनों को देश-विदेश तक नई पहचान दिलाई है।
इनका कहना है जब तक हम अपनी बोलचाल की भाषा में अपनी मायड़ भाषा राजस्थानी को प्राथमिकता नहीं देंगे तब तक कोई दूसरा हमारी भाषा को सम्मान नहीं देगा वर्तमान दौर में राजस्थानी लोकगीत,नृत्य में बढ़ रहे हैं अश्लीलता को लेकर काफी संवेदनशील और चिंतित है,लोकगीत और संगीत में रीमिक्स और रेप को लेकर इनका कहना है कि यह लोकगीत-संगीत की हत्या करने जैसा अपराध है। सीमा मिश्रा का कहना है कुछ रीमिक्स और तथाकथित “रेप म्यूजिक” शैली से प्रेरित वीडियो लोकगीतों को अश्लीलता और भड़काऊ प्रस्तुति की ओर ले जा रहे हैं। इससे न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो रही है, बल्कि नई पीढ़ी तक लोकसंगीत का विकृत स्वरूप पहुँच रहा है।
हमें आधुनिकता का विरोध नहीं करना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नवाचार हमारी संस्कृति की गरिमा और लोकमूल्यों के अनुरूप हो। कलाकारों, निर्माताओं, समाज और श्रोताओं,सभी की जिम्मेदारी है कि वे राजस्थानी लोकसंगीत की पवित्रता, मर्यादा और सांस्कृतिक गरिमा को बनाए रखें।
सीमा मिश्रा का जन्म शेखावाटी झुंझुनू जिले के बिसाऊ कस्बे में हुआ तथा बचपन से ही संगीत के प्रति उनका गहरा लगाव रहा। सीमा मिश्रा का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, विनम्र और सांस्कृतिक मूल्यों से ओत-प्रोत है। उनकी गायकी में राजस्थान की मिट्टी की सौंधी महक, लोकजीवन की संवेदनाएँ और भक्ति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। विगत 4 दशकों से लोक संगीत के संरक्षण,सृजन एवं संवर्धन की यात्रा के दौरान राजस्थान सहित देश-विदेश की सैकड़ो सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक संगठनों प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान द्वारा विभिन्न नाम,अलंकरण एवं उपाधियों से सम्मानित,अलंकृत किया जा चुका है। भारत की सर्वाधिक लोकप्रिय,सुपरहिट लोकगीत गाने वाली गायिका के रूप में सीमा मिश्रा को द फोक क्वीन ऑफ़ इंडिया लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है इसके साथ ही इन्हें प्रमुख रूप से भारत लोक संगीत विभूषण सम्मान, स्वर कलानिधि सम्मान,लता मंगेशकर स्वर कोकिला सम्मान, राजस्थान रत्न सम्मान,राजस्थान स्वर कोकिला सम्मान, राष्ट्र स्तरीय मास्टर मदन अवार्ड, भरत व्यास सम्मान,मरु कोकिला अलंकरण सम्मान,
रूपरामका सम्मान,राजस्थान रत्न शिरोमणि सम्मान, राजस्थान गौरव सम्मान, कुरजां बेटी सृष्टि रत्न सम्मान, स्वयं सिद्धा सम्मान,लंदन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत स्वर कोकिल,दूरदर्शन मोस्ट फेमस आर्टिस्ट अवार्ड, जी मीडिया द्वारा वुमन एंपावरमेंट अवार्ड, शेखावाटी रत्न सम्मान, रिफा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, रेडियो सिटी लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड,सृजन द स्पार्क खेमचंद प्रकाश सम्मान, पर्यटन एवं कला संस्कृति विभाग राजस्थान द्वारा अल्लाह जिलाई बाई लोक गायन सम्मान,स्वामी विवेकानंद मानद उपाधि, घूमर प्लैटिनम डिस्क अवार्ड, नमनश्री सम्मान, दुनिया के 10 बेहतरीन डांसिंग गायन घूमर लोक गीत के सिंगर के रूप में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड द्वारा बेस्ट सिंगर अवार्ड है।सीमा मिश्रा ने अब तक लगभग पांच हजार (5000) के आसपास राजस्थानी लोकगीत, विवाह गीत और भजन गाकर लोकसंगीत की अमूल्य धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
आज सीमा मिश्रा केवल एक लोकप्रिय गायिका ही नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान और लोकपरंपरा की सशक्त प्रतिनिधि भी हैं। उनकी संगीत साधना,सादगी और लोकसंस्कृति के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है।
मां का सपना बेटी की साधना
हर महान व्यक्तित्व के पीछे किसी न किसी प्रेरक शक्ति का मौन तप छिपा होता है। यह प्रेरक शक्ति कभी गुरु के रूप में, कभी परिवार के रूप में और प्रायः माँ के रूप में सामने आती है। राजस्थान की लोकसंगीत परम्परा को अपने मधुर स्वरों से नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाली मरु कोकिला, राजस्थान की लता सीमा मिश्रा की सफलता भी ऐसी ही एक माँ के त्याग, दूरदृष्टि और संकल्प की अनुपम कथा है।
सीमा मिश्रा की माताश्री लक्ष्मी मिश्रा स्वयं संगीत-प्रेमी थीं। उनके अंतर्मन में भी सुरों की साधना का एक सुंदर संसार बसता था, किन्तु उस समय की सामाजिक परिस्थितियाँ, रूढ़िवादी परम्पराएँ और पारिवारिक मर्यादाएँ उन्हें अपनी प्रतिभा को व्यापक मंच देने का अवसर नहीं दे सकीं। उन्होंने अपने सपनों को टूटने नहीं दिया, बल्कि उन्हें अपनी बेटी के भविष्य में रोप दिया। यही वह परिकल्पना थी, जिसने आगे चलकर राजस्थानी लोकसंगीत को उसकी एक अमूल्य धरोहर प्रदान की।
माँ ने बेटी के भीतर छिपी स्वर-साधना को बचपन में ही पहचान लिया। उन्होंने केवल संगीत का संस्कार ही नहीं दिया, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन और निरंतर अभ्यास का भाव भी जगाया। उस समय जब बेटियों का सार्वजनिक मंचों पर गाना सहज स्वीकार्य नहीं माना जाता था, तब लक्ष्मी मिश्रा ने समाज की संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर अपनी बेटी का हाथ थामा। यह निर्णय केवल एक माँ का नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी नारी का साहसिक संकल्प था। सीमा मिश्रा ने भी अपनी माँ के विश्वास को साधना का आधार बनाया उनकी सुरीली, भावपूर्ण और आत्मीय गायकी ने राजस्थानी लोकगीतों को नई पहचान दी। घूमर, कुरजा, पिपली,गोरबंद, चिरमी, मिश्री को बाग, कुएं पर एकली,चांद चढ्यौ गिगनार, ओल्यू, मांड, केसरिया बालम,सुपनो, मोरिया,विवाह गीत,भजन, तीज-गणगौर और लोकजीवन से जुड़े असंख्य गीतों को उन्होंने जिस आत्मीयता से स्वर दिया, उसने राजस्थान की सांस्कृतिक आत्मा को जन-जन तक पहुँचा दिया। उनके स्वरों में मरुभूमि की माटी की सोंधी महक, लोकजीवन की सहजता और राजस्थानी संस्कृति का गौरव एक साथ झलकता है।
आज सीमा मिश्रा केवल एक लोकप्रिय लोकगायिका नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी हैं। उनकी गायकी ने लोकसंगीत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। देश-विदेश में बसे लाखों राजस्थानी परिवारों के लिए उनकी आवाज़ अपनी मिट्टी की स्मृतियों का मधुर स्पर्श है।
सीमा मिश्रा की उपलब्धियाँ यह सिद्ध करती हैं कि जब किसी माँ का सपना बेटी की साधना से जुड़ जाता है, तब इतिहास बनता है। यह केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि नारी-शक्ति, मातृत्व और सांस्कृतिक चेतना की विजय है। स्वर्गीय लक्ष्मी मिश्रा ने जो स्वप्न देखा था, सीमा मिश्रा ने उसे अपने स्वर से साकार कर दिया। यही कारण है कि उनकी सफलता के पीछे एक माँ की तपस्या, विश्वास और त्याग का उज्ज्वल प्रकाश सदैव दिखाई देता है।
यह गाथा प्रत्येक माँ और प्रत्येक बेटी के लिए प्रेरणा है। यह बताती है कि सपने कभी समाप्त नहीं होते; वे पीढ़ियों के माध्यम से साकार होते हैं। माँ का विश्वास, बेटी की साधना और संस्कृति के प्रति समर्पण जब एक सूत्र में बंध जाते हैं, तब समाज को सीमा मिश्रा जैसी विभूतियाँ प्राप्त होती हैं।
लता की एकलव्य,लोक संस्कृति की स्वरदूत
सीमा मिश्रा को”मरू कोकिला” कहना किसी सम्मान का अलंकरण नहीं, बल्कि मरुभूमि की आत्मा का उद्घोष है। जिस प्रकार कोयल वसंत की दूत होती है, उसी प्रकार सीमा मिश्रा राजस्थान की लोकसंस्कृति की स्वरदूत हैं। उनके कंठ से निकला प्रत्येक गीत रेत के कण-कण को जीवन देता है, थार की हवाओं को मधुरता देता है और लोकजीवन के हर रंग को अमरता प्रदान करता है।
यदि साधना की प्रतिमूर्ति का नाम पूछा जाए,तो उत्तर होगा
“लता की एकलव्य सीमा मिश्रा।”
एकलव्य ने प्रत्यक्ष शिक्षा से नहीं,अपितु समर्पण, तपस्या और अटूट विश्वास से श्रेष्ठता प्राप्त की थी। मरू कोकिला सीमा मिश्रा ने बताया कि उनकी प्रथम गुरु उनकी मां लक्ष्मी मिश्रा तथा दूसरी गुरु भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी हैं। सीमा मिश्रा ने संगीत को केवल सीखा नहीं, उसे जिया है; केवल गाया नहीं,उसे साधा है; केवल प्रस्तुत नहीं किया, उसे अपने प्राणों में प्रतिष्ठित किया है। यही साधना उनके स्वरों को असाधारण बनाती है।
उनके गीतों में राजस्थान का इतिहास साँस लेता है। कहीं पनघट की खिलखिलाहट है, कहीं माँ की लोरी की कोमलता,कहीं नववधू की लाज,कहीं वीरभूमि का गौरव और कहीं लोकदेवताओं की आराधना। ऐसा प्रतीत होता है मानो सम्पूर्ण मरुधरा उनके कंठ में विराजमान हो और प्रत्येक स्वर के साथ अपनी सांस्कृतिक धरोहर संसार को सौंप रही हो।
सीमा मिश्रा ने यह सिद्ध किया है कि लोकसंगीत किसी संग्रहालय की धरोहर नहीं, बल्कि जीवंत संस्कृति की धड़कन है। उन्होंने आधुनिकता के प्रचंड प्रवाह में भी लोकधुनों की अखंड ज्योति को बुझने नहीं दिया। वे केवल गीत नहीं गातीं, वे पीढ़ियों को अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान से प्रेम करना सिखाती हैं।
उनका व्यक्तित्व विनम्रता का वटवृक्ष है और उनकी साधना तपस्या का हिमालय। लोकप्रियता उनके चरण चूमती है, पर अहंकार उनके द्वार तक नहीं पहुँच पाता। यही महान कलाकार की पहचान है—जितनी ऊँचाई, उतनी ही गहराई; जितनी प्रसिद्धि, उतनी ही सरलता।
आज जब बाज़ारवाद संगीत की आत्मा को चुनौती दे रहा है, तब सीमा मिश्रा का स्वर एक सांस्कृतिक संकल्प की तरह सुनाई देता है। वह कहता है—”जिस राष्ट्र की लोकधुनें जीवित हैं, उसकी आत्मा कभी पराजित नहीं हो सकती।”
सीमा मिश्रा केवल एक गायिका नहीं हैं; वे राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना की स्वरसरस्वती हैं। वे मरुधरा की वह गूँज हैं, जो समय के पार भी सुनाई देती रहेगी। वे माँ की ममता का संगीत हैं, साधना की तपश्चर्या हैं और लोकसंस्कृति के आकाश का वह ध्रुवतारा हैं, जिसकी आभा आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी जड़ों से जोड़ती रहेगी।सीमा मिश्रा एक ऐसी सुर-साधिका है,जिनके कंठ में सरस्वती का वरदहस्त, माँ का वात्सल्य,मरुभूमि का स्वाभिमान और भारतीय लोकसंस्कृति की अमर ध्वनि एक साथ स्पंदित होती है।।
लेखक : चंद्रजीत शेखावत
छापोली, झुंझुनू