• होम
  • उत्तर प्रदेश
  • तीन बच्चों की हत्या मामले में मां और कथित प्रेमी हाईकोर्ट से बरी

तीन बच्चों की हत्या मामले में मां और कथित प्रेमी हाईकोर्ट से बरी

इससे पहले औरैया की जिला अदालत ने प्रियंका और आशीष को हत्या तथा आपराधिक षड्यंत्र का दोषी माना था। दोनों को सजा सुनाई गई थी और उन पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब निचली अदालत की...

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • September 24, 2026 1:25 pm IST, Published 1 hour ago

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने औरैया में तीन बच्चों की हत्या के मामले में दोषी ठहराई गई मां प्रियंका और उसके कथित साथी आशीष उर्फ डैनी को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए दोनों आरोपियों की रिहाई के निर्देश दिए हैं, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।

यह मामला 27 जून 2024 को औरैया जिले में सामने आया था। सेंगर नदी से तीन बच्चों के शव बरामद होने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की थी। मृत बच्चों की पहचान माधव उर्फ गूंगा, आदित्य उर्फ टिल्ला और मंगल के रूप में हुई थी। उनकी उम्र क्रमश: छह, पांच और चार वर्ष बताई गई थी। घटना के बाद बच्चों की मां प्रियंका और आशीष उर्फ डैनी पर हत्या और आपराधिक साजिश में शामिल होने के आरोप लगाए गए थे।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, प्रियंका अपने चार बेटों को सुबह करीब पांच बजे सेंगर नदी पर बने पुल के पास लेकर गई थी। आरोप था कि उसने अपने मृत पति के छोटे भाई आशीष के साथ मिलकर बच्चों को रास्ते से हटाने की साजिश रची। अभियोजन ने दावा किया था कि बच्चों को नदी में डुबोने का प्रयास किया गया। इस घटना में तीन बच्चों की मौत हो गई, जबकि सबसे बड़ा बेटा सोनू बच गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान सोनू की गवाही अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण आधार बनी। सोनू ने अदालत को बताया था कि उसकी मां चारों बच्चों को नदी के पास ले गई थी और एक-एक करके उन्हें डुबोने का प्रयास किया गया। उसके मुताबिक उसने अपनी जान बचाने के लिए मरने का नाटक किया और बाद में किसी व्यक्ति से सहायता मांगी। अभियोजन ने इसी बयान को आरोपियों के खिलाफ प्रमुख साक्ष्य के तौर पर पेश किया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने सोनू की गवाही की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए। पीठ ने बयान में मौजूद विरोधाभासों को ध्यान में रखते हुए कहा कि गवाही में ऐसे संकेत दिखाई देते हैं, जिनसे यह आशंका पैदा होती है कि बच्चे को किसी ने घटनाक्रम के बारे में सिखाया या प्रभावित किया हो सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी बच्चे की कम उम्र मात्र से उसकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन ऐसी गवाही की विश्वसनीयता की विशेष सावधानी से जांच करना जरूरी है।

पीठ ने माना कि इस मामले में अभियोजन की पूरी कहानी को केवल सोनू की गवाही के आधार पर स्वीकार करना उचित नहीं होगा। जब गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभास मौजूद हों और अन्य साक्ष्य आरोपों को संदेह से परे स्थापित करने के लिए पर्याप्त न हों, तब दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती। आपराधिक मामलों में अभियोजन पर आरोपों को संदेह से परे साबित करने की जिम्मेदारी होती है।

इससे पहले औरैया की जिला अदालत ने प्रियंका और आशीष को हत्या तथा आपराधिक षड्यंत्र का दोषी माना था। दोनों को सजा सुनाई गई थी और उन पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब निचली अदालत की दोषसिद्धि और सजा दोनों समाप्त हो गई हैं।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन आरोपियों के खिलाफ अपराध साबित करने में आवश्यक कानूनी कसौटी पूरी नहीं कर पाया। इसी आधार पर प्रियंका के खिलाफ सुनाई गई फांसी की सजा और आशीष को दी गई उम्रकैद की सजा रद्द कर दी गई।

हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि दोनों आरोपी किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। फैसले के बाद मामले में अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों और गवाहों की विश्वसनीयता पर न्यायिक जांच का महत्व एक बार फिर सामने आया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि गंभीर अपराध का आरोप होने के बावजूद दोषसिद्धि तभी कायम रह सकती है, जब अभियोजन उपलब्ध साक्ष्यों के माध्यम से अपराध को कानूनी मानक के अनुसार साबित करे।

 

Advertisement