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मुकदमा लंबित है तो भी पासपोर्ट रोका नहीं जा सकता: इलाहाबाद हाई कोर्ट

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महेश कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने संबंधित कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए लखनऊ के क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को याचिकाकर्ता के पासपोर्ट आवेदन पर विचार

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  • September 23, 2026 5:27 pm IST, Published 48 minutes ago

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पासपोर्ट जारी करने और विदेश यात्रा की अनुमति के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के पास पासपोर्ट होना उसे स्वत: किसी दूसरे देश की सीमा में प्रवेश करने का अधिकार नहीं देता। विदेश जाने के लिए संबंधित देश के वीजा समेत अन्य आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करना जरूरी होता है। साथ ही, केवल इस आधार पर कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है, उसका पासपोर्ट जारी करने से इनकार नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें याचिकाकर्ता ने पासपोर्ट जारी करने के आवेदन पर कार्रवाई न होने का मुद्दा उठाया था। याचिकाकर्ता के खिलाफ दो आपराधिक मामले लंबित बताए गए हैं। उसका कहना था कि इन मामलों के कारण उसके पासपोर्ट आवेदन पर आगे की प्रक्रिया नहीं की जा रही है। उसने हाई कोर्ट से संबंधित अधिकारियों को पासपोर्ट जारी करने के संबंध में निर्देश देने की मांग की थी।

अदालत ने कहा कि पासपोर्ट को विदेश यात्रा की अंतिम अनुमति के तौर पर नहीं देखा जा सकता। पासपोर्ट एक नागरिक दस्तावेज है, जबकि किसी व्यक्ति को विदेश जाने की अनुमति कई अन्य कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है। संबंधित देश की वीजा नीति और प्रवेश संबंधी नियमों का पालन करना भी आवश्यक है। इसलिए पासपोर्ट जारी करने और विदेश यात्रा करने के अधिकार को एक ही विषय मानना उचित नहीं है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित होने मात्र से हर स्थिति में उसे विदेश जाने से रोकना जरूरी नहीं है। यदि किसी मामले में अदालत को लगता है कि संबंधित व्यक्ति के विदेश भागने की आशंका है या उसकी यात्रा से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, तो अभियोजन या पुलिस अदालत के समक्ष उचित आवेदन कर सकती है। अदालत परिस्थितियों को देखते हुए विदेश यात्रा पर रोक लगाने या यात्रा की अनुमति देते समय उपयुक्त शर्तें निर्धारित कर सकती है।

खंडपीठ ने यह अंतर भी रेखांकित किया कि विदेश यात्रा का प्रश्न उस समय प्रमुखता से सामने आता है, जब कोई व्यक्ति वास्तव में विदेश जाने की कोशिश कर रहा हो। इसके विपरीत, पासपोर्ट जारी करना उससे पहले की प्रक्रिया है। इसलिए किसी व्यक्ति के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले को आधार बनाकर पासपोर्ट आवेदन पर स्वत: रोक लगाना उचित नहीं माना जा सकता।

अदालत ने हालांकि यह भी कहा कि पासपोर्ट आवेदन के दौरान आवेदक को अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की सही जानकारी देनी होगी। यदि कोई व्यक्ति आवेदन में अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों को जानबूझकर छिपाता है, तो उसके मामले की स्थिति अलग हो सकती है और संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महेश कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने संबंधित कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए लखनऊ के क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को याचिकाकर्ता के पासपोर्ट आवेदन पर विचार करने के लिए अंतरिम निर्देश दिया। इस आदेश के साथ अदालत ने स्पष्ट किया कि आवेदन पर निर्णय कानून और लागू नियमों के अनुसार लिया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट के इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि आपराधिक मामले का सामना कर रहे व्यक्ति के पासपोर्ट आवेदन पर विचार करते समय परिस्थितियों और कानूनी प्रावधानों को अलग-अलग देखा जाना चाहिए। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 30 सितंबर की तारीख तय की है। इस दौरान संबंधित पक्षों की दलीलों और पासपोर्ट आवेदन से जुड़े पहलुओं पर आगे सुनवाई हो सकती है।

इस आदेश का मुख्य बिंदु यह है कि पासपोर्ट जारी किया जाना और विदेश यात्रा की अनुमति दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होने से पासपोर्ट आवेदन स्वत: खारिज नहीं किया जा सकता, जबकि विदेश यात्रा की स्थिति में अदालत जरूरत के अनुसार प्रतिबंध या शर्तें लगा सकती है।

 

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