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हाईकोर्ट ने पुलिस को सुनाया कानून का पाठ, न्यायिक प्रक्रिया सर्वोपरि बताई

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक मामले के न्यायालय में लंबित होने के बाद पुलिस अपने स्तर पर आगे की जांच (Further Investigation) शुरू करने का आदेश जारी नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि ऐसी किसी भी कार्रवाई के लिए संबंधित न्यायालय की पूर्व अनुमति आवश्यक है। […]

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  • August 7, 2026 1:40 pm IST, Published 1 hour ago

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक मामले के न्यायालय में लंबित होने के बाद पुलिस अपने स्तर पर आगे की जांच (Further Investigation) शुरू करने का आदेश जारी नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि ऐसी किसी भी कार्रवाई के लिए संबंधित न्यायालय की पूर्व अनुमति आवश्यक है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना जारी किया गया कोई भी आदेश न्यायिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कानपुर के संयुक्त पुलिस आयुक्त (JCP) द्वारा कथित रूप से बिना न्यायालय की अनुमति आगे की जांच के लिए दिए गए आदेश पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जब कोई मामला न्यायालय के विचाराधीन हो, तब पुलिस अधिकारियों को कानून के दायरे में रहते हुए ही कार्रवाई करनी चाहिए और किसी भी अतिरिक्त जांच के लिए पहले अदालत से अनुमति प्राप्त करनी चाहिए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच अधिकारी (आईओ) द्वारा प्रस्तुत आवेदन की भाषा पर भी नाराजगी व्यक्त की। न्यायालय ने टिप्पणी की कि आवेदन का स्वर विनम्र अनुमति मांगने के बजाय ऐसा प्रतीत होता है, मानो पुलिस अधिकारी पहले ही जांच शुरू करने का निर्णय ले चुके हों और अदालत को केवल इसकी सूचना दे रहे हों। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में इस प्रकार का रवैया स्वीकार्य नहीं है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को केवल प्रशासनिक पद के आधार पर न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं मिल जाता। यदि किसी मामले में आगे की जांच आवश्यक प्रतीत होती है, तो पुलिस को विधि के अनुरूप संबंधित अदालत के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर अनुमति मांगनी चाहिए। न्यायालय ने कहा कि यही प्रक्रिया कानून की भावना और न्यायिक मर्यादा के अनुरूप है।

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना न्यायालय की अनुमति जारी किए गए आदेश के आधार पर की गई जांच को वैधानिक मान्यता नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि ऐसे आदेश के तहत की गई समस्त कार्रवाई कानून की दृष्टि में प्रभावहीन होगी। साथ ही निर्देश दिया कि इस प्रकार की जांच से संबंधित रिकॉर्ड को न्यायालय की कार्यवाही का हिस्सा न माना जाए।

अदालत ने अपने फैसले में न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान पर विशेष जोर दिया। न्यायालय ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में एक बार आरोपपत्र दाखिल होने और मामला अदालत के समक्ष आने के बाद आगे की जांच से जुड़े सभी निर्णय न्यायालय की निगरानी में ही होने चाहिए। इससे निष्पक्ष सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला पुलिस प्रशासन और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय है। उनके अनुसार, अदालत ने यह संदेश दिया है कि कानून के शासन में प्रत्येक संस्था को अपने संवैधानिक और वैधानिक दायरे में रहकर कार्य करना चाहिए। न्यायिक अनुमति के बिना आगे की जांच शुरू करना प्रक्रिया संबंधी नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है।

इस फैसले से भविष्य में ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश उपलब्ध होंगे। यदि किसी मामले में नए तथ्य सामने आते हैं या अतिरिक्त जांच की आवश्यकता महसूस होती है, तो संबंधित अदालत से अनुमति लेना अनिवार्य होगा।  इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल एक मामले तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आपराधिक न्याय प्रणाली में प्रक्रियागत अनुशासन और न्यायालय की सर्वोच्च भूमिका को रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण आदेश माना जा रहा है।

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