प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आगरा की दो सगी बहनों से जुड़े मामले में मुआवजा देने के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह मामला धर्म परिवर्तन के बाद दोनों बहनों को कथित तौर पर बंधक बनाए जाने के आरोपों से जुड़ा है। एकल पीठ ने पहले इस मामले में पिता और राज्य सरकार को मुआवजा देने का निर्देश दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए एकल पीठ के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।
मामले के अनुसार, आगरा के सदर बाजार निवासी अनिल भाटिया की दो बेटियां अंशु भाटिया और दिया भाटिया हैं। बड़ी बेटी अंशु भाटिया की उम्र 35 वर्ष बताई गई है, जबकि छोटी बेटी दिया भाटिया 20 वर्ष की हैं। दोनों ने धर्म परिवर्तन के बाद क्रमशः आमिना और जोया नाम अपना लिया था। मामला उस समय न्यायालय पहुंचा, जब दोनों बहनों की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से संबंधित कार्यवाही हुई। इस तरह की याचिका के जरिए अदालत से यह जांचने का अनुरोध किया जाता है कि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में तो नहीं रखा गया है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान दोनों बहनों ने एकल पीठ के समक्ष अपना पक्ष रखा था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मामले में उनके धर्म परिवर्तन और कथित तौर पर बंधक बनाए जाने के आरोप प्रमुख मुद्दे रहे। न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने सुनवाई के बाद पिता और राज्य सरकार को मुआवजा देने का आदेश दिया था। हालांकि, मुआवजे की राशि और आदेश में दर्ज सभी तथ्यों का पूरा विवरण उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं है।
एकल पीठ के इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने हाई कोर्ट की खंडपीठ के समक्ष याचिका दाखिल की। सरकार की ओर से आदेश को चुनौती दिए जाने के बाद मामले की सुनवाई मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की पीठ में हुई। खंडपीठ ने सरकार की याचिका पर विचार करते हुए एकल पीठ के मुआवजा संबंधी आदेश के क्रियान्वयन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। इस अंतरिम आदेश के बाद मुआवजे को लेकर आगे की कार्रवाई फिलहाल न्यायालय के अगले निर्देश पर निर्भर करेगी।
मामले में यह अंतर करना जरूरी है कि मुआवजा देने के आदेश पर रोक लगना पूरे विवाद का अंतिम निपटारा नहीं है। खंडपीठ का आदेश फिलहाल अगली सुनवाई तक प्रभावी रहेगा। राज्य सरकार की याचिका पर आगे सुनवाई के दौरान एकल पीठ के आदेश को चुनौती देने वाले पक्ष की दलीलों और संबंधित कानूनी पहलुओं पर विचार किया जा सकता है। अंतिम फैसला आने तक मुआवजे के मुद्दे पर स्थिति अंतरिम रहेगी।
यह मामला धर्म परिवर्तन, वयस्क महिलाओं की इच्छा और स्वतंत्रता तथा कथित अवैध हिरासत जैसे संवेदनशील कानूनी प्रश्नों से जुड़ा है। ऐसे मामलों में अदालत के सामने संबंधित व्यक्तियों के बयान, उपलब्ध साक्ष्य और लागू कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, इस मामले में उपलब्ध संक्षिप्त जानकारी से सभी आरोपों और पक्षों की दलीलों का पूरा विवरण सामने नहीं आता है। इसलिए किसी भी आरोप को अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य के तौर पर प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ के ताजा आदेश के बाद अब मामले की अगली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। उस दौरान राज्य सरकार की चुनौती और मुआवजा देने के पूर्व आदेश से जुड़े कानूनी सवालों पर आगे विचार किया जाएगा। फिलहाल अदालत ने केवल मुआवजे के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगाई है; मामले के अंतिम परिणाम को लेकर अभी कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।