मुख्तार अंसारी की जब्त जमीन पर बने फ्लैट्स में नया बवाल

लखनऊ: लखनऊ में पूर्व बाहुबली और माफिया सरगना मुख्तार अंसारी से जुड़ी जमीन पर विकसित किए गए आवासीय फ्लैट्स एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गए हैं। जिन फ्लैट्स की चाभी हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लाभार्थियों को सौंपकर उन्हें नए घर का सपना दिया था, अब उन्हीं फ्लैट्स पर सिंचाई […]

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  • June 18, 2026 5:19 pm IST, Published 1 hour ago

लखनऊ: लखनऊ में पूर्व बाहुबली और माफिया सरगना मुख्तार अंसारी से जुड़ी जमीन पर विकसित किए गए आवासीय फ्लैट्स एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गए हैं। जिन फ्लैट्स की चाभी हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लाभार्थियों को सौंपकर उन्हें नए घर का सपना दिया था, अब उन्हीं फ्लैट्स पर सिंचाई विभाग की ओर से लगाए गए नोटिस ने सैकड़ों परिवारों की चिंता बढ़ा दी है।

मामले ने तब तूल पकड़ा जब फ्लैट परिसर में अचानक एक नोटिस चस्पा कर दिया गया, जिसमें सात दिनों के भीतर कब्जा हटाने की चेतावनी दी गई थी। नोटिस सामने आते ही आवंटियों के बीच अफरा-तफरी मच गई और लोगों ने प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।

जानकारी के अनुसार, लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने मुख्तार अंसारी से जुड़ी जब्त भूमि पर आवासीय परियोजना विकसित की थी। इस परियोजना के तहत 72 फ्लैट्स तैयार किए गए और बाद में पात्र लाभार्थियों को उनका आवंटन किया गया। कई परिवारों ने इन मकानों को अपने स्थायी आशियाने के रूप में स्वीकार करते हुए यहां रहने की तैयारी शुरू कर दी थी।

लेकिन सिंचाई विभाग की ओर से लगाए गए नोटिस ने पूरे मामले को नए विवाद में बदल दिया। नोटिस में भूमि पर विभागीय अधिकार का हवाला देते हुए कब्जा हटाने की बात कही गई थी, जिससे लोगों में भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई।

फ्लैट आवंटियों का कहना है कि उन्होंने सरकारी प्रक्रिया के तहत मकान प्राप्त किए हैं और उन्हें यह भरोसा दिलाया गया था कि सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ही आवंटन किया गया है। ऐसे में अचानक नोटिस लगने से लोग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे।

कई परिवारों ने सवाल उठाया कि यदि भूमि को लेकर कोई विवाद था तो आवंटन से पहले उसका समाधान क्यों नहीं किया गया। लोगों का कहना है कि वे किसी विभागीय विवाद का हिस्सा नहीं हैं और उन्हें अनिश्चितता में नहीं रखा जाना चाहिए।

नोटिस लगने के बाद स्थानीय स्तर पर लोगों ने विरोध दर्ज कराया। आवंटियों और स्थानीय नागरिकों की नाराजगी के बीच संबंधित विभाग ने बाद में नोटिस हटा लिया। इतना ही नहीं, जिस स्थान पर नोटिस लगाया गया था, वहां रंग पोतकर उसे ढंक भी दिया गया।

हालांकि नोटिस हटने के बाद भी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। लोगों के मन में यह सवाल बना हुआ है कि आखिर भूमि का वास्तविक स्वामित्व किसके पास है और भविष्य में उनके आवास को लेकर कोई खतरा तो नहीं खड़ा होगा।

इस पूरे घटनाक्रम ने सरकारी विभागों के बीच समन्वय को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर विकास प्राधिकरण द्वारा परियोजना विकसित कर आवंटन किया गया, वहीं दूसरी ओर दूसरे विभाग की ओर से कब्जा हटाने का नोटिस जारी होना प्रशासनिक स्तर पर भ्रम की स्थिति को दर्शाता है। ऐसे मामलों में विभिन्न विभागों के बीच स्पष्ट समन्वय और कानूनी स्थिति का पहले से समाधान आवश्यक होता है, ताकि आम नागरिकों को परेशानी का सामना न करना पड़े।

फिलहाल नोटिस हटाए जाने से लाभार्थियों को अस्थायी राहत जरूर मिली है, लेकिन पूरे मामले पर अंतिम स्थिति स्पष्ट होना अभी बाकी है। अब लोगों की नजर प्रशासन और संबंधित विभागों के अगले कदम पर टिकी हुई है। यदि भूमि स्वामित्व और अधिकारों को लेकर कोई विवाद है तो उसका स्थायी समाधान निकालना जरूरी होगा, ताकि आवंटियों के मन में बनी अनिश्चितता समाप्त हो सके।

यह मामला केवल एक आवासीय परियोजना का नहीं, बल्कि उन परिवारों के भरोसे का भी है जिन्होंने सरकारी योजनाओं के तहत अपने घर का सपना पूरा होने की उम्मीद की थी।

 

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