मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किए गए कथित लाठीचार्ज का मामला अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) तक पहुंच गया है। घटना को गंभीरता से लेते हुए आयोग ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और प्रमुख सचिव (गृह) को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। आयोग ने राज्य सरकार से पूरे घटनाक्रम, पुलिस कार्रवाई के कारणों और प्रदर्शनकारियों के साथ हुए व्यवहार पर जवाब मांगा है। इस घटनाक्रम ने प्रदेश की कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यशैली को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार मेरठ में नागरिकों का एक समूह अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहा था। इसी दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ गया। आरोप है कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें कई प्रदर्शनकारियों को चोटें आईं। घटना के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं, जिसके बाद विभिन्न सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने कहा है कि यदि प्रथम दृष्टया लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो यह नागरिकों के मौलिक और मानवाधिकारों के उल्लंघन का मामला हो सकता है। इसलिए घटना की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
आयोग ने अपने नोटिस में राज्य के पुलिस महानिदेशक और प्रमुख सचिव (गृह) से पूछा है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने किन परिस्थितियों में बल प्रयोग किया, क्या बल प्रयोग आवश्यक था, और क्या निर्धारित मानकों का पालन किया गया। साथ ही आयोग ने यह भी जानना चाहा है कि घटना में घायल लोगों को क्या चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराई गई और क्या पूरे घटनाक्रम की विभागीय जांच शुरू की गई है।
घटना के बाद विपक्षी दलों ने भी राज्य सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वाले नागरिकों पर बल प्रयोग उचित नहीं है। उनका कहना है कि यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था तो पुलिस को संयम बरतना चाहिए था। वहीं सत्तारूढ़ पक्ष का कहना है कि पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए और पूरे मामले की जांच की जाएगी।
मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। हालांकि यदि प्रदर्शन हिंसक हो जाए या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने लगे तो प्रशासन को हस्तक्षेप करने का अधिकार होता है। ऐसे मामलों में यह देखना महत्वपूर्ण होता है कि पुलिस द्वारा किया गया बल प्रयोग परिस्थितियों के अनुरूप और न्यूनतम था या नहीं।
मेरठ की इस घटना के वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा शुरू हो गई। कई लोगों ने पुलिस कार्रवाई को कठोर बताया, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि घटना के सभी तथ्यों के सामने आने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। इसी कारण NHRC की जांच रिपोर्ट को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से फिलहाल कहा गया है कि पूरे घटनाक्रम की समीक्षा की जा रही है। यदि कहीं किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना था और किसी भी नागरिक के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ओर से रिपोर्ट तलब किए जाने के बाद प्रशासनिक स्तर पर मामले की गंभीरता और बढ़ गई है। आयोग की जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई तय हो सकती है। यदि जांच में पुलिस की कार्रवाई अनुचित पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश भी की जा सकती है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हाल के वर्षों में देशभर में प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों पर मानवाधिकार आयोग लगातार सक्रिय रहा है। आयोग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो।
फिलहाल सभी की निगाहें उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस विभाग द्वारा NHRC को भेजी जाने वाली रिपोर्ट पर टिकी हैं। रिपोर्ट के आधार पर आयोग आगे की कार्रवाई करेगा। यदि जांच में किसी प्रकार की लापरवाही या मानवाधिकारों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित पक्षों के खिलाफ आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।