मध्यस्थता की सीट बदली नहीं जा सकती, हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) मामलों में न्यायिक अधिकारिता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कार्यवाही का स्थान बदल जाने मात्र से अदालत की अधिकारिता नहीं बदलती। अदालत ने कहा कि मध्यस्थता की निर्धारित ‘सीट’ ही यह तय करती है कि विवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई किस […]

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  • June 15, 2026 11:16 am IST, Published 2 hours ago

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) मामलों में न्यायिक अधिकारिता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कार्यवाही का स्थान बदल जाने मात्र से अदालत की अधिकारिता नहीं बदलती। अदालत ने कहा कि मध्यस्थता की निर्धारित ‘सीट’ ही यह तय करती है कि विवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई किस न्यायालय में होगी।

न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की एकल पीठ ने बीबी कोटेक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई करते हुए कानपुर नगर की वाणिज्यिक अदालत के 17 फरवरी 2026 के आदेश को रद्द कर दिया। वाणिज्यिक अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि चूंकि मध्यस्थता की कार्यवाही प्रयागराज में संचालित की जा रही थी, इसलिए मामले की सुनवाई का अधिकार प्रयागराज की अदालत को है।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित खरीद आदेश की शर्तों में स्पष्ट रूप से कानपुर नगर को मध्यस्थता की ‘सीट’ निर्धारित किया गया था। साथ ही यह भी तय किया गया था कि विवाद की स्थिति में कानपुर की अदालतों को विशेष अधिकारिता प्राप्त होगी। इसी आधार पर समय-विस्तार से संबंधित आवेदन कानपुर की वाणिज्यिक अदालत में दाखिल किया गया था।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि कई बार पक्षकारों की सुविधा के लिए मध्यस्थता की कार्यवाही किसी अन्य शहर में आयोजित की जाती है, लेकिन इससे अनुबंध में तय की गई ‘सीट’ और उससे जुड़ी कानूनी अधिकारिता प्रभावित नहीं होती। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘सीट’ और ‘वेन्यू’ दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि ‘सीट’ वह कानूनी स्थान है, जो पर्यवेक्षी न्यायालय का निर्धारण करता है, जबकि ‘वेन्यू’ केवल सुनवाई या बैठक आयोजित करने का सुविधाजनक स्थान हो सकता है। इसलिए यदि कार्यवाही प्रयागराज में हुई, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि कानपुर की अदालतें अपना अधिकार खो दें।

हाई कोर्ट ने माना कि पक्षकारों ने जानबूझकर कानपुर नगर को मध्यस्थता की सीट के रूप में चुना था। ऐसे में इस विवाद से जुड़े सभी न्यायिक मामलों पर सुनवाई का अधिकार केवल कानपुर की अदालतों को ही रहेगा।

फैसले में अदालत ने कहा कि वाणिज्यिक अदालत द्वारा क्षेत्राधिकार के अभाव का आधार बनाकर याचिका खारिज करना उचित नहीं था। इसलिए आदेश को निरस्त करते हुए मामला पुनः कानपुर नगर की वाणिज्यिक अदालत को भेज दिया गया है। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि संबंधित अदालत कानून के अनुसार मामले पर दो माह के भीतर नया निर्णय पारित करे। यह फैसला मध्यस्थता मामलों में ‘सीट’ और ‘वेन्यू’ को लेकर उत्पन्न होने वाले विवादों को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण साबित होगा।

 

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