पटना में मीडिया से बातचीत के दौरान सहनी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में “अघोषित इमरजेंसी” जैसी स्थिति बनी हुई है। उनका आरोप था कि यदि किसी दूसरे राज्य का पूर्व मंत्री अपने राजनीतिक या संगठनात्मक कार्यक्रम के सिलसिले में उत्तर प्रदेश जाता है और उसे कार्यक्रम करने से रोका जाता है या नजरबंद किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।
उन्होंने कहा कि विपक्ष के नेताओं के कार्यक्रमों पर रोक लगाने और उनकी गतिविधियों को सीमित करने की कोशिश यह दर्शाती है कि सरकार राजनीतिक विरोध से असहज है। सहनी ने दावा किया कि लोकतंत्र में सभी राजनीतिक दलों और नेताओं को अपनी बात रखने तथा जनता के बीच जाने का समान अधिकार होना चाहिए।
वीआईपी प्रमुख ने आरोप लगाया कि इस तरह की कार्रवाई से यह संदेश जाता है कि सरकार विपक्ष की राजनीतिक सक्रियता से भयभीत है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन यदि विपक्ष के कार्यक्रमों में प्रशासनिक स्तर पर बाधाएं खड़ी की जाती हैं तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल खड़े होते हैं।
मुकेश सहनी ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में लगातार संगठनात्मक स्तर पर काम कर रही है और भविष्य में भी राजनीतिक गतिविधियां जारी रहेंगी। उन्होंने विश्वास जताया कि जनता लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर अपना फैसला करेगी और आने वाले समय में राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव देखने को मिलेगा। हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सहनी के आरोपों पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।