नई दिल्ली: प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के पद से जुड़े प्रस्तावित विधेयक पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण संशोधन सुझाए हैं। समिति का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा बनाए रखने के लिए ऐसी स्थिति नहीं होनी चाहिए, जिसमें कोई व्यक्ति लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहते हुए भी सरकार का संचालन करता रहे। इसी सोच के साथ समिति ने कई नए प्रावधानों की सिफारिश की है।
रिपोर्ट के अनुसार, यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री ऐसे मामले में 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहता है, जिसमें अधिकतम पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो, तो 31वें दिन उसे कार्यकारी पद छोड़ना होगा। यदि संबंधित व्यक्ति स्वयं इस्तीफा नहीं देता, तो निर्धारित समय पूरा होने पर उसे पद से हटाया हुआ माना जाएगा।
हालांकि, समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस व्यवस्था का अर्थ जनप्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त होना नहीं है। संबंधित व्यक्ति सांसद, विधायक या विधान परिषद सदस्य के रूप में तब तक बना रह सकता है, जब तक जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत उसे अयोग्य घोषित नहीं किया जाता।
संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री न्यायिक हिरासत से रिहा हो जाता है और उसके खिलाफ कानूनी बाधाएं समाप्त हो जाती हैं, तो उसे दोबारा संबंधित पद संभालने का अवसर मिल सके। यानी प्रस्तावित व्यवस्था के तहत पद से हटाया जाना स्थायी नहीं, बल्कि परिस्थितियों के आधार पर अस्थायी होगा।
रिपोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 75, अनुच्छेद 164 और अनुच्छेद 239AA में आवश्यक संशोधन करने की सिफारिश की गई है। साथ ही इन बदलावों को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 तथा केंद्र शासित प्रदेश अधिनियम, 1963 (पुडुचेरी) के प्रावधानों के अनुरूप लागू करने का भी सुझाव दिया गया है।
समिति ने स्पष्ट किया है कि इन प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य आपराधिक कानूनों में बदलाव करना या किसी आरोपी के निर्दोष माने जाने के सिद्धांत को प्रभावित करना नहीं है। इसी तरह सांसदों और विधायकों की अयोग्यता से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 में भी किसी प्रकार के संशोधन का प्रस्ताव नहीं दिया गया है।
JPC का कहना है कि यह व्यवस्था संघीय ढांचे के अनुरूप होगी। किसी मंत्री को पद से हटाने की प्रक्रिया प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की सलाह से ही होगी। यदि 30 दिनों की निर्धारित अवधि के भीतर ऐसी सलाह नहीं दी जाती, तो संबंधित मंत्री को स्वतः पदमुक्त माना जाएगा। समिति की इस रिपोर्ट को 17 जुलाई की बैठक में औपचारिक मंजूरी दिए जाने की संभावना जताई गई है।
संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की रिपोर्ट अंतिम रूप लेने के बाद प्रस्तावित विधेयक को दोबारा केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जा सकता है, जहां सुझाए गए संशोधनों पर विचार किया जाएगा। यदि सरकार इन सिफारिशों को मंजूरी देती है, तो विधेयक को 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में पेश किए जाने की संभावना है।
वहीं, कई विपक्षी दलों ने इस प्रस्तावित विधेयक पर आपत्ति जताई है। विपक्ष के कुछ दलों ने न केवल इसका विरोध किया, बल्कि संयुक्त संसदीय समिति की प्रक्रिया से भी दूरी बनाए रखी और अपने प्रतिनिधियों को समिति में शामिल नहीं किया। चूंकि प्रस्तावित बदलाव संवैधानिक प्रकृति के हैं, इसलिए इन्हें कानून का रूप देने के लिए संसद के दोनों सदनों में आवश्यक विशेष बहुमत (दो-तिहाई समर्थन) हासिल करना होगा।