प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पूर्व विधान परिषद सदस्य (MLC) और सहारनपुर स्थित ग्लोकल यूनिवर्सिटी के चांसलर हाजी इकबाल उर्फ बाला के खिलाफ दर्ज कथित धोखाधड़ी के मामले में एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया है। हालांकि अदालत ने मामले की जांच उत्तर प्रदेश पुलिस से हटाकर गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) को सौंपने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि समान तथ्यों पर अलग-अलग एजेंसियों द्वारा समानांतर जांच से कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए न्यायहित में पूरे मामले की जांच एक ही एजेंसी के पास रहना उचित होगा।
विवाद ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-12 स्थित एक व्यावसायिक भूखंड से जुड़ा है, जिसे एक निजी कंपनी को आवंटित किया गया था। शिकायतकर्ता नावेद अहमद का आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2013-14 के दौरान परियोजना के विकास के लिए करीब 6.33 करोड़ रुपये का भुगतान किया था, लेकिन निर्धारित परियोजना पर कोई काम शुरू नहीं हुआ।
बाद में संबंधित कंपनी कथित रूप से विकास प्राधिकरण की बकाया किस्तें भी जमा नहीं कर सकी। इसके चलते वर्ष 2022 में प्राधिकरण ने भूखंड का आवंटन रद्द कर दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर एसटीएफ की प्रारंभिक जांच के बाद एफआईआर दर्ज की गई।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि हाजी इकबाल और उनसे जुड़ी कुछ कंपनियों के खिलाफ पहले से ही SFIO जांच कर रहा है। यह जांच एक अन्य मामले में न्यायालय के निर्देश के बाद शुरू हुई थी और उससे संबंधित शिकायत दिल्ली की विशेष अदालत में लंबित है। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वर्तमान एफआईआर उन्हीं तथ्यों पर आधारित है जिनकी जांच SFIO पहले से कर रहा है। इसलिए अलग से पुलिस जांच कानून के अनुरूप नहीं है।
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि पुलिस जांच और SFIO की जांच का दायरा अलग-अलग है और दोनों की प्रकृति भी भिन्न है। राज्य ने FIR को बरकरार रखने की मांग की। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि रिकॉर्ड से यह प्रतीत होता है कि दोनों जांचों में कई तथ्य समान हैं। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 212(2) का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि जब किसी मामले की जांच SFIO को सौंप दी जाती है, तो समान विषय पर अन्य एजेंसियों द्वारा जांच जारी रखना उचित नहीं माना जा सकता।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता के व्यक्तिगत वित्तीय नुकसान से जुड़े कुछ पहलू SFIO की मौजूदा जांच में विस्तार से शामिल नहीं हैं। इसके बावजूद न्यायहित में संपूर्ण जांच सामग्री एक ही एजेंसी को उपलब्ध कराना आवश्यक है। हाई कोर्ट ने STF को निर्देश दिया कि वह इस मामले से संबंधित केस डायरी, गवाहों के बयान, दस्तावेज और अब तक जुटाए गए सभी साक्ष्य SFIO को सौंप दे। साथ ही दिल्ली की विशेष अदालत, जहां SFIO का मामला लंबित है, उसे भी इस आदेश की जानकारी देने को कहा गया है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच को SFIO को सौंपने का निर्णय याचिकाकर्ता को राहत देने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए समानांतर जांच से बचने और न्यायिक प्रक्रिया को सुव्यवस्थित रखने के लिए लिया गया है।