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जलवायु संकट से लड़ाई में वन अधिकारी होंगे सबसे बड़ी ताकत: राष्ट्रपति मुर्मु

नई दिल्ली: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भारतीय वन सेवा (IFS) के प्रशिक्षु अधिकारियों से पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि समाज की भागीदारी के बिना वन संरक्षण के प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि जब स्थानीय समुदाय, जनजातीय समाज, किसान, महिलाएं और वनवासी संरक्षण अभियानों का […]

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  • July 17, 2026 4:40 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भारतीय वन सेवा (IFS) के प्रशिक्षु अधिकारियों से पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि समाज की भागीदारी के बिना वन संरक्षण के प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि जब स्थानीय समुदाय, जनजातीय समाज, किसान, महिलाएं और वनवासी संरक्षण अभियानों का हिस्सा बनेंगे, तभी प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा लंबे समय तक सुनिश्चित की जा सकेगी।

राष्ट्रपति भवन के सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित कार्यक्रम में भारतीय वन सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों ने राष्ट्रपति से मुलाकात की। इस दौरान राष्ट्रपति ने अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी जिम्मेदारी केवल वनों के प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि वे देश की प्राकृतिक धरोहर के संरक्षक भी हैं। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में कमी और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी वैश्विक चुनौतियों के दौर में भारतीय वन सेवा की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

राष्ट्रपति ने कहा कि वन केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी पर जीवन का आधार हैं। इसलिए युवा अधिकारियों को वन क्षेत्र के विस्तार, जैव विविधता के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उनके प्रयास न केवल भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा को मजबूत करेंगे, बल्कि वैश्विक स्तर पर सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में भी योगदान देंगे।

उन्होंने अधिकारियों को सलाह दी कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक होगा। किसी भी विकास परियोजना को इस दृष्टि से आगे बढ़ाया जाना चाहिए कि प्रकृति और स्थानीय समुदाय दोनों को उसका लाभ मिले। उन्होंने कहा कि संरक्षण और विकास को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक माना जाना चाहिए।

राष्ट्रपति ने जनभागीदारी को वन संरक्षण की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि जनजातीय समुदायों, वनवासियों, महिलाओं, किसानों और स्थानीय संस्थाओं के अनुभव और सुझाव नीति निर्माण तथा संरक्षण कार्यों को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। यदि समाज स्वयं वनों की सुरक्षा का भागीदार बनता है, तो संरक्षण के प्रयास अधिक टिकाऊ और सफल साबित होंगे।

उन्होंने कहा कि लोक सेवा का मूल उद्देश्य नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना और राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है। वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पर्यावरणीय सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण अनिवार्य है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारतीय वन सेवा के युवा अधिकारी देश की विकास यात्रा को हरित, समावेशी और टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

वर्तमान में भारतीय वन सेवा के वर्ष 2024 और 2025 बैच के प्रशिक्षु अधिकारी देहरादून स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। वर्ष 2024 बैच में 111 और वर्ष 2025 बैच में 131 प्रशिक्षु अधिकारी शामिल हैं। दोनों बैचों में भूटान के दो-दो प्रशिक्षु अधिकारी भी प्रशिक्षण ले रहे हैं, जो भारत और भूटान के बीच पर्यावरणीय सहयोग को भी दर्शाता है।

 

 

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