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भाई-बहन के झगड़े में पक्षपात, बच्चों के दिल पर छोड़ देता है गहरा असर

परिवार में भाई-बहन का रिश्ता अक्सर शरारत, झगड़े, रूठने-मनाने और गहरे अपनत्व से भरा होता है। बचपन में दोनों के बीच छोटी-छोटी बातों पर नोकझोंक होना सामान्य है। कभी बहन भाई को चिढ़ाती है, कभी भाई उसकी चीज छीन लेता है और फिर कुछ देर बाद दोनों साथ खेलते नजर आते हैं। लेकिन इसी रिश्ते […]

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  • August 29, 2026 12:35 pm IST, Published 1 hour ago

परिवार में भाई-बहन का रिश्ता अक्सर शरारत, झगड़े, रूठने-मनाने और गहरे अपनत्व से भरा होता है। बचपन में दोनों के बीच छोटी-छोटी बातों पर नोकझोंक होना सामान्य है। कभी बहन भाई को चिढ़ाती है, कभी भाई उसकी चीज छीन लेता है और फिर कुछ देर बाद दोनों साथ खेलते नजर आते हैं। लेकिन इसी रिश्ते के बीच एक ऐसा सवाल भी मौजूद है, जिस पर परिवारों को गंभीरता से विचार करना चाहिए,जब भाई-बहन के बीच विवाद हो, तो माता-पिता न्याय किस आधार पर करते हैं?

कई घरों में यह देखने को मिलता है कि छोटे बच्चों के झगड़े में माता-पिता तुरंत किसी एक बच्चे का पक्ष ले लेते हैं। अक्सर बेटी के रोने या नाराज होने पर पिता उसे समझाने के बजाय भाई को डांट देते हैं। दूसरी ओर, कुछ परिवारों में बेटे को अधिक महत्व मिलने की शिकायत भी सामने आती है। यानी समस्या केवल यह नहीं है कि किसे अधिक प्यार मिला, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या बच्चों के बीच विवाद को निष्पक्ष तरीके से समझने की कोशिश की जाती है।

बचपन में माता-पिता का व्यवहार बच्चों की सोच पर गहरा असर डालता है। जब किसी बच्चे को बार-बार यह महसूस कराया जाता है कि उसकी बात सुने बिना ही दूसरे बच्चे को सही मान लिया जाएगा, तो उसके भीतर उपेक्षा और अन्याय की भावना पैदा हो सकती है। वह अपने माता-पिता से शिकायत करना कम कर सकता है और धीरे-धीरे अपनी भावनाएं दबाने की आदत डाल सकता है। इसके विपरीत, जिस बच्चे को हर परिस्थिति में माता-पिता का समर्थन मिलता है, उसके भीतर यह भावना भी विकसित हो सकती है कि गलती करने के बाद भी उसे बचा लिया जाएगा।

यहीं से पालन-पोषण की एक बड़ी चुनौती सामने आती है। बच्चों के बीच समान व्यवहार का अर्थ यह नहीं है कि हर परिस्थिति में दोनों को बराबर डांट या बराबर सजा दी जाए। वास्तविक समानता का अर्थ है कि गलती किसकी है, यह समझने की कोशिश की जाए और उसके अनुसार प्रतिक्रिया दी जाए। यदि भाई दोषी है तो उसे समझाया जाए और यदि बहन की गलती है तो उसे भी उसी तरह अपनी गलती स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया जाए।

बच्चों के बीच झगड़ा होने पर माता-पिता को तत्काल फैसला सुनाने के बजाय दोनों की बात सुननी चाहिए। कई बार छोटे बच्चे घटना को अपनी-अपनी नजर से देखते हैं और दोनों को लगता है कि गलती सामने वाले की है। ऐसे में माता-पिता का काम किसी एक को विजेता घोषित करना नहीं, बल्कि बच्चों को विवाद सुलझाने का तरीका सिखाना है।

विशेष रूप से पिता की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय परिवारों में पिता को अक्सर अनुशासन और निर्णय का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में यदि पिता बिना पूरी बात समझे किसी एक बच्चे के पक्ष में खड़े हो जाएं, तो दूसरे बच्चे पर उसका भावनात्मक असर अधिक हो सकता है। वहीं यदि पिता गलती करने वाले बच्चे को प्यार से समझाते हुए यह भी स्पष्ट करें कि गलती स्वीकार करना जरूरी है, तो बच्चे को अनुशासन और स्नेह दोनों का संतुलन समझ में आता है।

यह चर्चा केवल हिंदू परिवारों तक सीमित करके देखना भी उचित नहीं होगा। भाई-बहन के बीच पक्षपात, लैंगिक भूमिकाओं की अपेक्षाएं और बच्चों के साथ अलग-अलग व्यवहार दुनिया के अनेक परिवारों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देते हैं। इसलिए इसे किसी एक धर्म या समुदाय की जन्मजात विशेषता मानने के बजाय परिवार, संस्कृति, सामाजिक सोच और व्यक्तिगत पालन-पोषण की आदतों के संदर्भ में देखना अधिक उपयोगी होगा।

इसी तरह पितृसत्ता को आनुवंशिकी से जोड़ना भी वैज्ञानिक दृष्टि से सही निष्कर्ष नहीं है। सामाजिक व्यवहार और पारिवारिक भूमिकाएं केवल जीन से निर्धारित नहीं होतीं। बच्चे अपने आसपास के व्यवहार, परिवार की मान्यताओं, सामाजिक वातावरण और शिक्षा से बहुत कुछ सीखते हैं। इसका मतलब यह भी है कि गलत परंपराओं को बदला जा सकता है।

बच्चों को न्याय सिखाने की शुरुआत घर से होती है। अगर माता-पिता यह आदत विकसित करें कि किसी भी विवाद में पहले पूरी बात सुनी जाएगी, गलती करने वाले बच्चे को उसकी उम्र के अनुसार जिम्मेदारी समझाई जाएगी और किसी बच्चे को केवल बेटा या बेटी होने के आधार पर प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तो घर का माहौल काफी स्वस्थ बन सकता है।

भाई-बहन का रिश्ता जीवन के सबसे लंबे रिश्तों में से एक हो सकता है। बचपन के छोटे-छोटे अनुभव आगे चलकर इस रिश्ते की नींव बनते हैं। इसलिए माता-पिता का लक्ष्य केवल उस समय का झगड़ा खत्म करना नहीं होना चाहिए, बल्कि बच्चों को सम्मान, जिम्मेदारी, क्षमा और निष्पक्षता का अर्थ समझाना होना चाहिए।

अंततः सवाल यह नहीं है कि पिता ने बेटी को गोद में लिया या बेटे को डांट दिया। असली सवाल यह है कि क्या बच्चे को उसकी बात रखने का अवसर मिला, क्या गलती को गलती कहा गया और क्या दोनों बच्चों को यह भरोसा मिला कि उनके माता-पिता उन्हें समान सम्मान देते हैं। परिवार में न्याय का अर्थ कठोरता नहीं, बल्कि निष्पक्षता है। प्यार का अर्थ गलती को नजरअंदाज करना नहीं, बल्कि बच्चे को सही और गलत के बीच अंतर समझाने की जिम्मेदारी निभाना है। यही वह संस्कार है जो अगली पीढ़ी को पुराने भेदभाव से आगे ले जा सकता है।

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