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ISRO निजीकरण पर घमासान, 9 संगठनों ने सरकार से मांगा जवाब

नई दिल्ली, 6 सितंबर 2026। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के भविष्य और अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका को लेकर अब संगठन के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। नौ कर्मचारी संगठनों ने अंतरिक्ष विभाग और ISRO के अध्यक्ष वी. नारायणन को लिखे पत्र में अंतरिक्ष क्षेत्र में चल रहे बदलावों […]

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  • September 6, 2026 10:06 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली, 6 सितंबर 2026। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के भविष्य और अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका को लेकर अब संगठन के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। नौ कर्मचारी संगठनों ने अंतरिक्ष विभाग और ISRO के अध्यक्ष वी. नारायणन को लिखे पत्र में अंतरिक्ष क्षेत्र में चल रहे बदलावों पर स्पष्ट और आधिकारिक जवाब मांगा है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी का वे विरोध नहीं करते, लेकिन ISRO की मूल वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को कमजोर करने वाली किसी भी नीति पर पारदर्शी चर्चा जरूरी है।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को सरकारी संस्थानों से आगे बढ़ाकर निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए भी खोल रहा है। अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधारों के तहत निजी कंपनियों को उपग्रह, प्रक्षेपण यान और अंतरिक्ष आधारित सेवाओं से जुड़ी गतिविधियों में भाग लेने के अवसर दिए जा रहे हैं। IN-SPACe को निजी क्षेत्र की गतिविधियों को बढ़ावा देने, अनुमति देने और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है।

9 कर्मचारी संगठनों ने उठाए बड़े सवाल

4 सितंबर को भेजे गए संयुक्त प्रतिनिधित्व में नौ कर्मचारी संगठनों ने ISRO की भविष्य की भूमिका को लेकर कई सवाल उठाए। इनमें ISRO Staff Association, SHAR Employees Association, ISAC Employees Association, ISRO Staff Association-LPSC, NRSA Employees Union समेत अन्य संगठन शामिल हैं। इन संगठनों का प्रतिनिधित्व ISRO और अंतरिक्ष विभाग के विभिन्न केंद्रों में कार्यरत कर्मचारियों से जुड़ा है।

कर्मचारी संगठनों की मुख्य चिंता उन रिपोर्टों और हालिया बयानों को लेकर है, जिनमें कहा गया है कि आने वाले समय में ISRO लॉन्च व्हीकल के निर्माण और कुछ नियमित उपग्रह निर्माण गतिविधियों से पीछे हट सकता है तथा इन कार्यों को निजी कंपनियों या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को सौंपा जा सकता है।

IN-SPACe के चेयरमैन पवन कुमार गोयनका के हालिया बयान के बाद यह मुद्दा और ज्यादा चर्चा में आया। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने कहा था कि भविष्य में ISRO लॉन्च व्हीकल का निर्माण नहीं करेगा और यह काम निजी क्षेत्र या PSU के जरिए किया जाएगा। कर्मचारी संगठनों ने इसी बयान के आधार पर पूछा है कि क्या यह भारत सरकार, अंतरिक्ष आयोग या अंतरिक्ष विभाग का आधिकारिक निर्णय है।

PSLV, LVM3 और SSLV पर भी उठे सवाल

कर्मचारी संगठनों ने विशेष रूप से PSLV, LVM3 और SSLV जैसे महत्वपूर्ण प्रक्षेपण यानों के भविष्य को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है। उनका सवाल है कि इन वाहनों की डिजाइन, विकास, निर्माण, एकीकरण, परीक्षण और लॉन्च जैसी गतिविधियां भविष्य में ISRO के पास रहेंगी या इन्हें भी निजी क्षेत्र को सौंपा जाएगा।

SSLV के मामले में तकनीक और उत्पादन से जुड़ी जिम्मेदारियां निजी/औद्योगिक क्षेत्र की ओर ले जाने की प्रक्रिया पहले से चर्चा में है। वहीं PSLV और LVM3 के निर्माण में भी उद्योग की भूमिका बढ़ाने की दिशा में काम चल रहा है। कर्मचारी संगठनों को आशंका है कि यदि इन गतिविधियों का बड़ा हिस्सा ISRO से बाहर चला गया तो संगठन के भीतर काम की प्रकृति में बड़ा बदलाव आ सकता है।

ISRO को सिर्फ R&D तक सीमित न किया जाए’

कर्मचारी संगठनों ने अपने प्रतिनिधित्व में यह चिंता जताई है कि निजी भागीदारी के नाम पर ISRO को केवल एक शोध एवं विकास संस्था तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार लॉन्च व्हीकल का डिजाइन, परीक्षण, एकीकरण और लॉन्च ऑपरेशन केवल उत्पादन गतिविधियां नहीं हैं, बल्कि देश की रणनीतिक और तकनीकी क्षमता से भी सीधे जुड़े हुए हैं।

संगठनों का कहना है कि भारत में निजी कंपनियों को बढ़ावा देना अंतरिक्ष क्षेत्र के विस्तार के लिए जरूरी है, लेकिन इसके साथ ISRO की इन-हाउस क्षमता, विशेषज्ञता और संस्थागत अनुभव भी सुरक्षित रहना चाहिए।

कर्मचारियों को नौकरी और भर्ती की चिंता

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू ISRO के कर्मचारियों का भविष्य भी है। कर्मचारी संगठनों ने पूछा है कि यदि मौजूदा कामों को निजी कंपनियों या PSU को स्थानांतरित किया जाता है तो वर्तमान कर्मचारियों की जिम्मेदारियों, पदों, पदोन्नति और भविष्य की भर्ती पर इसका क्या असर पड़ेगा।

संगठनों का कहना है कि यदि ISRO के भीतर नियमित तकनीकी और उत्पादन गतिविधियां कम होती हैं तो भविष्य में नए पदों पर भर्ती प्रभावित हो सकती है। साथ ही मौजूदा कर्मचारियों के लिए करियर प्रगति और विशेषज्ञता के इस्तेमाल को लेकर भी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

ISRO की 2025-26 वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, अंतरिक्ष विभाग में कुल स्वीकृत पदों की संख्या 20,269 थी, जिसमें ISRO और अंतरिक्ष विभाग के लिए 19,178 पद शामिल थे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारी ISRO के कार्यबल का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा हैं। ऐसे में संगठन की भूमिका में कोई बड़ा बदलाव कर्मचारियों और मानव संसाधन नीति के लिए महत्वपूर्ण माना जाएगा।

सरकार की अंतरिक्ष नीति क्या कहती है?

भारत की अंतरिक्ष नीति में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने का स्पष्ट प्रावधान है। ISRO की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, सुधारों का उद्देश्य निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को अंतरिक्ष गतिविधियों में अवसर देना तथा ISRO को नई तकनीक, उन्नत मिशन और क्षमता निर्माण पर अधिक ध्यान देने की दिशा में आगे बढ़ाना है। NSIL को व्यावसायिक गतिविधियों और लॉन्च सेवाओं से जुड़े कार्यों में बड़ी भूमिका देने की व्यवस्था भी की गई है।

इसलिए मौजूदा विवाद को सीधे तौर पर ‘ISRO का निजीकरण हो गया’ कहना सही नहीं होगा। फिलहाल कर्मचारी संगठनों ने प्रस्तावित बदलावों की आधिकारिक स्थिति और भविष्य की भूमिका को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है। उपलब्ध आधिकारिक नीति दस्तावेज निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की बात करते हैं, जबकि कर्मचारी संगठन यह जानना चाहते हैं कि ISRO की मुख्य जिम्मेदारियों की सीमा आखिर कहां तक रहेगी।

पवन गोयनका के बयान के बाद बढ़ी हलचल

इस पूरे विवाद की शुरुआत अगस्त में पवन गोयनका के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दिए गए बयान से हुई। इसके बाद कर्मचारी संगठनों ने 4 सितंबर को संयुक्त प्रतिनिधित्व भेजकर पूछा कि क्या यह बयान किसी स्वीकृत सरकारी नीति को दर्शाता है या यह भविष्य की दिशा को लेकर उनका आकलन है।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार और ISRO आने वाले समय में अपनी आधिकारिक भूमिका को किस तरह स्पष्ट करते हैं। कर्मचारी संगठनों ने मांग की है कि किसी भी बड़े और अपरिवर्तनीय फैसले से पहले कर्मचारियों के प्रतिनिधियों से संवाद किया जाए।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश एक तरफ निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में आगे बढ़ाना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ ISRO की रणनीतिक और वैज्ञानिक क्षमता को भी मजबूत बनाए रखना चाहता है। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार का आधिकारिक स्पष्टीकरण इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकता है।

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