• होम
  • दिल्ली/NCR
  • DU में हॉस्टल संकट: 2.5 लाख छात्रों पर सिर्फ 7 हजार बेड

DU में हॉस्टल संकट: 2.5 लाख छात्रों पर सिर्फ 7 हजार बेड

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) में पढ़ाई का सपना लेकर देशभर से आने वाले हजारों छात्रों के सामने अब एक बड़ा सवाल खड़ा है—कॉलेज में दाखिला मिलने के बाद रहने की सुरक्षित जगह कहां मिलेगी? विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या करीब 2.5 लाख है, जबकि आधिकारिक और उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक हॉस्टल की क्षमता करीब […]

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • September 10, 2026 9:23 am IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) में पढ़ाई का सपना लेकर देशभर से आने वाले हजारों छात्रों के सामने अब एक बड़ा सवाल खड़ा है—कॉलेज में दाखिला मिलने के बाद रहने की सुरक्षित जगह कहां मिलेगी? विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या करीब 2.5 लाख है, जबकि आधिकारिक और उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक हॉस्टल की क्षमता करीब 7 हजार बेड के आसपास है। यानी बड़ी संख्या में छात्रों को कैंपस से बाहर निजी पीजी, किराए के कमरों और साझा आवास का सहारा लेना पड़ता है।

हालिया सत्य निकेतन पीजी हादसे ने इस पुराने संकट को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। दक्षिणी दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में छात्रों को रहने की सुविधा देने वाली पांच मंजिला इमारत के गिरने से सात लोगों की मौत हुई। हादसे के बाद यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब विश्वविद्यालयों में हॉस्टल की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, तो बाहर रहने वाले छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

2.5 लाख छात्रों के मुकाबले बेहद कम हॉस्टल

दिल्ली विश्वविद्यालय की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़ों के आधार पर कुल नियमित छात्र संख्या करीब 2.51 लाख बताई गई है। इनमें लगभग 2.10 लाख स्नातक छात्र, 34,520 स्नातकोत्तर एवं शोधार्थी तथा 6,047 प्रमाणपत्र और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के विद्यार्थी शामिल हैं। इसके मुकाबले विश्वविद्यालय और संबद्ध कॉलेजों की हॉस्टल क्षमता करीब 6,500 से 7,000 के बीच बताई जा रही है।

यानी हर 100 छात्रों में बहुत छोटे हिस्से को ही संस्थागत हॉस्टल मिल पाता है। यही वजह है कि दिल्ली से बाहर के शहरों और राज्यों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए पीजी और किराए के मकान लगभग मजबूरी बन जाते हैं।

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक DU में करीब 7,224 आधिकारिक हॉस्टल बेड हैं। इनमें कॉलेज हॉस्टलों में लगभग 3,688 बेड और विश्वविद्यालय के गैर-कॉलेज हॉस्टलों में करीब 3,536 बेड शामिल हैं। आने वाले समय में कुछ नए हॉस्टल प्रोजेक्ट से लगभग 863 अतिरिक्त बेड जुड़ने की उम्मीद है।

57 कॉलेजों में हॉस्टल सुविधा नहीं

हॉस्टल संकट केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों में हॉस्टल सुविधा उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार 77 संबद्ध कॉलेजों में केवल करीब 20 कॉलेजों में हॉस्टल सुविधा है, जबकि 57 कॉलेजों में छात्रों के लिए संस्थागत हॉस्टल उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इन कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मजबूरन आसपास के इलाकों में कमरा या पीजी तलाशना पड़ता है।

नॉर्थ कैंपस और साउथ कैंपस के आसपास छात्र आवास की मांग इसी वजह से लगातार बढ़ी है। सत्य निकेतन, मुखर्जी नगर, नेहरू विहार, मुनिरका और आसपास के कई इलाके छात्रों के पीजी हब के रूप में विकसित हो चुके हैं।

पीजी में महंगा किराया, सुरक्षा पर सवाल

कैंपस से बाहर रहने वाले छात्रों की परेशानी सिर्फ कमरे की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। कई इलाकों में छात्रों को छोटे कमरे साझा करने पड़ते हैं। किराए के साथ बिजली, मेंटेनेंस और अन्य शुल्क अलग से लिए जाते हैं। कई पुराने भवनों में वेंटिलेशन, संकरी सीढ़ियों, जर्जर दीवारों और अग्नि सुरक्षा जैसी सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

साउथ कैंपस के आसपास छात्रों के लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती है। कई विद्यार्थी कॉलेज के नजदीक रहने के लिए ऐसी जगह भी चुन लेते हैं जहां भवन की स्थिति या सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जानकारी उनके पास नहीं होती।

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले छात्रों के लिए विकल्प और भी सीमित हैं। सुरक्षित और महंगा फ्लैट लेना संभव नहीं होता, जबकि विश्वविद्यालय का हॉस्टल मिलना बेहद प्रतिस्पर्धी है। ऐसे में साझा पीजी ही सबसे व्यावहारिक विकल्प रह जाता है।

छात्राओं के लिए बढ़ जाती है चिंता

छात्र आवास की समस्या का असर छात्राओं पर भी पड़ता है। परिवार अक्सर सुरक्षा, आने-जाने की सुविधा, महिला वार्डन, सीसीटीवी और भवन की स्थिति जैसी चीजों को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन जब सुरक्षित और किफायती हॉस्टल उपलब्ध नहीं होते, तो परिवारों के सामने सीमित विकल्प बचते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च शिक्षा तक पहुंच का मतलब सिर्फ कॉलेज में दाखिला नहीं होना चाहिए। दूसरे राज्यों से आने वाले छात्रों के लिए सुरक्षित आवास भी शिक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा है।

सत्य निकेतन हादसे के बाद बढ़ा दबाव

सत्य निकेतन हादसे ने छात्र आवास की व्यवस्था पर सवाल और तेज कर दिए हैं। हादसे के बाद दिल्ली में पीजी और छात्रावासों के नियमन की मांग उठी है। दिल्ली सरकार ने पीजी के लिए लाइसेंसिंग, पुलिस सत्यापन, संरचनात्मक सुरक्षा और फायर सेफ्टी जैसे प्रावधानों पर काम शुरू किया है। प्रस्तावित व्यवस्था में पीजी को पंजीकृत करने और उनकी जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराने जैसे कदमों पर भी विचार किया जा रहा है।

वहीं, दिल्ली हाई कोर्ट में भी DU के सभी कॉलेजों में हॉस्टल सुविधा उपलब्ध कराने की मांग को लेकर जनहित याचिका पहुंच चुकी है। 9 सितंबर 2026 को अदालत ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली विश्वविद्यालय को नोटिस जारी किया। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को निर्धारित है।

अब समाधान की जरूरत

DU जैसे देश के प्रमुख विश्वविद्यालय में हॉस्टल की कमी वर्षों पुरानी समस्या है, लेकिन बढ़ती छात्र संख्या और दिल्ली में महंगे होते किराए के कारण इसका असर लगातार गंभीर हो रहा है। केवल नए कॉलेज खोलना या सीटें बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती आवास की व्यवस्था भी शिक्षा के बुनियादी ढांचे का हिस्सा बनानी होगी।

विशेषज्ञों ने विश्वविद्यालय से जुड़े हॉस्टल, अधिकृत निजी हॉस्टल और सुरक्षित पीजी मॉडल को बढ़ावा देने की जरूरत बताई है। साथ ही पुराने भवनों का नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट, फायर सेफ्टी जांच, आपातकालीन निकासी व्यवस्था और शिकायत निवारण प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाना जरूरी है।

सत्य निकेतन हादसे ने यह साफ कर दिया है कि छात्रों के लिए सुरक्षित छत कोई विलासिता नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा और जीवन का जरूरी हिस्सा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के सामने अब चुनौती सिर्फ हॉस्टल बेड बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसा आवास तंत्र तैयार करने की है जहां छात्र बिना डर और आर्थिक दबाव के अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें।

Advertisement