मामला वर्ष 2018 का है। एस.एस. दास को उस समय सेवा से हटाने के लिए मौलिक नियम 56(j), यानी FR 56(j), का सहारा लिया गया था। सरकार की ओर से उन्हें सेवा के लिए उपयोगी नहीं रहने वाला अधिकारी यानी ‘डेडवुड’ मानते हुए अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई। दास ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला न्यायिक प्रक्रिया से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान अधिकारी के पूरे सेवा रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण माना। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि दास का सेवा करियर लगातार अच्छा रहा था। उन्हें अलग-अलग मौकों पर ‘आउटस्टैंडिंग’ और ‘वेरी गुड’ जैसी ग्रेडिंग मिली थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति से कुछ समय पहले ही उन्हें संयुक्त सचिव स्तर के पद के लिए पदोन्नत किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को सामान्य परिस्थितियों से अलग माना। अदालत के अनुसार, यदि किसी अधिकारी को हाल में उच्च पद की जिम्मेदारी संभालने योग्य माना गया है और उसके कुछ ही समय बाद उसे ‘डेडवुड’ बताकर सेवा से बाहर किया जाता है, तो ऐसे निर्णय के पीछे ठोस, विश्वसनीय और स्पष्ट आधार होना जरूरी है। केवल सामान्य या अस्पष्ट आधार पर इतनी गंभीर कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि FR 56(j) सरकार को सार्वजनिक हित में किसी कर्मचारी को समय से पहले सेवानिवृत्त करने का अधिकार देता है। हालांकि, इस अधिकार का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि इस प्रावधान को कर्मचारी को हटाने के आसान रास्ते के रूप में इस्तेमाल करना उचित नहीं होगा। सेवा रिकॉर्ड और उपलब्ध सामग्री के आधार पर निर्णय की वास्तविकता और तर्कसंगतता पर ध्यान देना आवश्यक है।
इस मामले में अदालत ने केवल अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश रद्द करने तक खुद को सीमित नहीं रखा। पीठ ने माना कि अचानक और इस तरह सेवा समाप्त किए जाने से अधिकारी की पेशेवर प्रतिष्ठा और गरिमा पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि अधिकारी को वे सभी परिणामी सेवा और वित्तीय लाभ दिए जाएं, जिनके वे हकदार होते अगर उन्हें सामान्य रूप से सेवा जारी रखने दी जाती।
अदालत ने उन काल्पनिक यानी नॉशनल पदोन्नतियों का लाभ देने का भी निर्देश दिया, जो अधिकारी को सेवा में बने रहने की स्थिति में मिल सकती थीं। इसके साथ ही केंद्र सरकार को 15 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारी को ऐसी सम्मानजनक विदाई दी जाए, जैसी उन्हें सामान्य सेवानिवृत्ति पर मिलनी चाहिए थी।
यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अदालत ने समय से पहले अनिवार्य सेवानिवृत्ति के मामले में सरकार की शक्ति और उसके इस्तेमाल की सीमा दोनों को स्पष्ट किया है। संदेश साफ है कि जनहित में FR 56(j) का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन किसी कर्मचारी के लंबे और अच्छे सेवा रिकॉर्ड की अनदेखी करके केवल उसे सेवा से हटाने के उद्देश्य से इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। खास तौर पर तब, जब संबंधित अधिकारी को हाल ही में पदोन्नति देकर उसकी योग्यता और सेवा क्षमता पर भरोसा जताया गया हो।
एस.एस. दास के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि सरकारी सेवा में अधिकारों के साथ कर्मचारी की प्रतिष्ठा और गरिमा की भी कानूनी अहमियत है। अदालत द्वारा सेवा लाभ बहाल करने, नॉशनल प्रमोशन देने, मुआवजा देने और सम्मानजनक विदाई का निर्देश इस मामले को विशेष महत्व देता है। भविष्य में FR 56(j) के तहत होने वाली अनिवार्य सेवानिवृत्ति की न्यायिक समीक्षा में इस फैसले का हवाला दिया जा सकता है।