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73वें-74वें संशोधन की समीक्षा पर बोले रामबहादुर राय, ‘गांधी मार्ग से मोदी मार्ग’ तक सवाल

महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी और नीचे से ऊपर की ओर शासन की कल्पना से जुड़ा था। वहीं पिछले वर्षों में डिजिटल शासन, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, केंद्रीय योजनाओं और तकनीक आधारित

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  • September 26, 2026 12:59 pm IST, Published 14 hours ago

‘अस्सी के राय साहब’ पुस्तक के लोकार्पण समारोह में वरिष्ठ पत्रकार और प्रज्ञा संस्थान के संस्थापक न्यासी रामबहादुर राय ने भारतीय लोकतंत्र, संविधान और सत्ता के विकेंद्रीकरण से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। अपने संबोधन में उन्होंने 73वें और 74वें संविधान संशोधनों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन संशोधनों के जरिए गांव और शहर के स्तर पर सत्ता को मजबूत करने की कोशिश हुई थी, लेकिन तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद यह देखने की जरूरत है कि इनका वास्तविक उद्देश्य कितना पूरा हुआ है। उन्होंने इसी संदर्भ में देश की राजनीतिक यात्रा को ‘गांधी मार्ग से मोदी मार्ग’ तक पहुंचने की चर्चा से जोड़ा और संविधान तथा शासन व्यवस्था की मौजूदा जरूरतों के संदर्भ में समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।

73वां और 74वां संविधान संशोधन भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक आधार देने वाले महत्वपूर्ण कदम थे। हालांकि इनके विधायी प्रयास 1991 के दौर में आगे बढ़े, लेकिन दोनों संविधान संशोधन अधिनियम 1992 में संसद से पारित हुए और 1993 में प्रभावी हुए। 73वें संशोधन के माध्यम से पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला, जबकि 74वें संशोधन ने शहरी स्थानीय निकायों को संविधान में स्थान दिया। 73वें संशोधन के तहत संविधान में भाग-9 और 11वीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों से जुड़े 29 विषय शामिल किए गए। वहीं 74वें संशोधन के जरिए भाग-9ए और 12वीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें नगर निकायों से संबंधित 18 विषय रखे गए।

इन संशोधनों की मूल भावना सत्ता के विकेंद्रीकरण से जुड़ी थी। इसका मतलब था कि शासन और विकास से जुड़े फैसलों में गांवों और शहरों की स्थानीय संस्थाओं की भूमिका बढ़े। पंचायतों और नगर निकायों को नियमित चुनाव, आरक्षण और संस्थागत व्यवस्था के जरिए लोकतांत्रिक ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया। स्थानीय स्तर पर जनता की भागीदारी बढ़ाना और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकास की योजना तैयार करना इस व्यवस्था के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल रहा।

रामबहादुर राय ने सवाल उठाया कि तीन दशक से अधिक समय के बाद इस व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन क्यों नहीं किया जाना चाहिए। उनके कथन का व्यापक संदर्भ यह है कि संविधान ने स्थानीय संस्थाओं को जो भूमिका दी थी, उसके अनुरूप उन्हें वास्तविक अधिकार, वित्तीय संसाधन और प्रशासनिक क्षमता कितनी मिली, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। स्थानीय शासन को लेकर ‘कार्य, वित्त और कर्मचारी’ यानी तीनों स्तरों पर अधिकारों के हस्तांतरण का सवाल लंबे समय से चर्चा में रहा है।

73वें और 74वें संशोधनों के बाद स्थानीय लोकतंत्र का विस्तार जरूर हुआ, लेकिन राज्यों में इनके क्रियान्वयन का स्वरूप एक जैसा नहीं रहा। पंचायतों और नगर निकायों की वास्तविक शक्तियां काफी हद तक राज्य कानूनों, वित्तीय व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे पर निर्भर करती हैं। इसलिए समीक्षा का एक महत्वपूर्ण विषय यह हो सकता है कि स्थानीय संस्थाओं को संविधान में मिली भूमिका के अनुरूप निर्णय लेने की कितनी स्वतंत्रता हासिल है।

रामबहादुर राय की बात का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष गांधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा और मौजूदा शासन मॉडल के बीच संबंध से जुड़ा है। महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी और नीचे से ऊपर की ओर शासन की कल्पना से जुड़ा था। वहीं पिछले वर्षों में डिजिटल शासन, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, केंद्रीय योजनाओं और तकनीक आधारित प्रशासन ने शासन के तरीके को काफी बदला है। ऐसे में सवाल उठता है कि स्थानीय लोकतंत्र को आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था के साथ किस तरह जोड़ा जाए।

‘गांधी मार्ग से मोदी मार्ग’ का संदर्भ इसी व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक बदलाव की ओर संकेत करता है। इसे केवल किसी एक सरकार या दल तक सीमित करने के बजाय भारत में शासन की बदलती शैली के रूप में भी देखा जा सकता है। गांधी के समय में ग्राम आधारित स्वावलंबन और स्थानीय भागीदारी प्रमुख विचार थे, जबकि आज डिजिटल तकनीक, बुनियादी ढांचे, तेज संचार और प्रत्यक्ष सरकारी सेवाओं ने शासन की प्रकृति को बदल दिया है। इन दोनों अनुभवों के बीच संतुलन तलाशना स्थानीय लोकतंत्र की चर्चा का हिस्सा बन सकता है।

राय के वक्तव्य में संविधान की समीक्षा का सवाल संविधान को बदलने की मांग के रूप में नहीं, बल्कि उसके प्रावधानों के व्यावहारिक प्रभाव का मूल्यांकन करने के संदर्भ में सामने आता है। तीन दशक से अधिक समय में देश की अर्थव्यवस्था, आबादी, शहरों का विस्तार, तकनीक और प्रशासनिक जरूरतें काफी बदल चुकी हैं। ऐसे में यह देखना स्वाभाविक है कि स्थानीय शासन की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था आज की चुनौतियों के लिए पर्याप्त है या उसमें नए प्रावधानों और संस्थागत सुधारों की जरूरत है।

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विशेष रूप से तेजी से बढ़ते शहरों में नगर निकायों के सामने परिवहन, कचरा प्रबंधन, जलापूर्ति, आवास, प्रदूषण और शहरी नियोजन जैसी चुनौतियां बढ़ी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतों के सामने रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और स्थानीय बुनियादी ढांचे से जुड़े सवाल हैं। ऐसे में स्थानीय संस्थाओं को केवल चुनावी प्रतिनिधित्व तक सीमित रखने के बजाय उन्हें प्रभावी प्रशासनिक इकाई बनाने पर चर्चा जरूरी हो जाती है।

रामबहादुर राय के विचारों का केंद्रीय प्रश्न यही दिखाई देता है कि संविधान ने स्थानीय लोकतंत्र के लिए जो रास्ता बनाया था, वह जमीन पर कितना प्रभावी साबित हुआ और बदलते भारत में उसे किस तरह आगे बढ़ाया जा सकता है। ‘अस्सी के राय साहब’ के लोकार्पण समारोह में उठाया गया यह सवाल संविधान, लोकतंत्र और शासन व्यवस्था पर व्यापक बहस का आधार बन सकता है।

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