प्रयागराज: कोमा में गए किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके बैंक खाते में जमा रकम हासिल करने के लिए परिवार को कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़े, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐसे मामलों में स्पष्ट व्यवस्था की जरूरत पर जोर देते हुए केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि ऐसी विशेष परिस्थितियों में खाताधारक के आश्रितों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए कानून या स्पष्ट दिशा-निर्देश होने चाहिए, ताकि वे इलाज का खर्च और घर की जरूरतें पूरी करने के लिए बैंक में जमा धन का उपयोग कर सकें।
न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने यह टिप्पणी कानपुर नगर की रहने वाली परवीन जहां की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याची के पति शमशाद अली कोमा में चले गए थे और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। उनके बैंक खाते में जमा रकम प्राप्त करने में आ रही परेशानी के चलते परिवार को कानूनी रास्ता अपनाना पड़ा। मामले में अदालत ने फिलहाल परवीन जहां को उत्तराधिकार की प्रक्रिया के माध्यम से भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के खाते में जमा धनराशि प्राप्त करने की छूट दी है।
सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि परवीन जहां ने जुलाई में याचिका दाखिल कर मल्टीपल डिसेबिलिटी एक्ट, 1999 के तहत खुद को अपने पति का अभिभावक घोषित किए जाने की मांग की थी। हालांकि, पति की मृत्यु के बाद बैंक खाते में जमा रकम हासिल करने का सवाल अलग कानूनी प्रक्रिया से जुड़ गया। इस स्थिति ने ऐसे मामलों में लागू होने वाली व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं।
खंडपीठ ने कहा कि कोमा में रहने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके परिवार के सदस्य कई बार आर्थिक रूप से असहाय हो जाते हैं। अस्पताल के खर्च, घरेलू जरूरतों और अन्य जरूरी भुगतान के लिए उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं बचते, जबकि संबंधित व्यक्ति के बैंक खाते में धनराशि मौजूद हो सकती है। इसके बावजूद उस रकम तक पहुंचने में कानूनी औपचारिकताएं बाधा बन सकती हैं। अदालत ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए ऐसी परिस्थितियों के लिए स्पष्ट नियम बनाने की आवश्यकता जताई।
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और आरबीआई को अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। दोनों से अलग-अलग हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा गया है कि क्या कोमा जैसी विशेष चिकित्सा परिस्थितियों में खाताधारक के आश्रितों को बैंक में जमा धनराशि उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रस्ताव, विशेष व्यवस्था या दिशा-निर्देश मौजूद हैं। अदालत ने याची को आरबीआई के कार्यकारी निदेशक (बैंकिंग विनियमन) और केंद्रीय वित्त मंत्रालय के सचिव को भी मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है।
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से भी इस समस्या के समाधान की दिशा में ठोस कदमों पर विचार करने को कहा है। खंडपीठ ने केरल हाई कोर्ट के शोभा गोपालकृष्णन बनाम केरल राज्य मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया, जिनका संदर्भ उमा मित्तल मामले में भी आया है। अदालत के अनुसार, राज्य सरकार इन दिशा-निर्देशों पर विचार करके ऐसे मामलों में राहत देने की संभावनाएं तलाश सकती है।
हाई कोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव को भी ठोस समाधान के साथ हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्धारित समय पर संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में मुख्य सचिव को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ सकता है। केंद्र सरकार और आरबीआई की ओर से हलफनामा दाखिल नहीं किए जाने पर संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति के संबंध में भी आदेश दिया जा सकता है।
मामले की अगली सुनवाई छह नवंबर को निर्धारित की गई है। इस प्रकरण में अदालत के निर्देश भविष्य में ऐसे परिवारों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं, जिन्हें किसी सदस्य के कोमा में जाने या उसकी मृत्यु के बाद बैंक खाते में जमा धनराशि प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। फिलहाल अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है और व्यापक समाधान की दिशा में कानूनी व्यवस्था स्पष्ट करने पर जोर दिया है।