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संजय राउत ने सुप्रीम कोर्ट से मांगी बिना शर्त माफी, 17 नवंबर को पेश होंगे

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल माफीनामे के बावजूद मामले का निपटारा अभी नहीं हुआ है। अदालत को यह तय करना है कि राउत की ओर से व्यक्त किया गया खेद और बिना शर्त माफी स्वीकार करने योग्य है या नहीं। इस संबंध में अंतिम निर्णय न्यायालय ही करेगा। 17 नवंबर की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि उस दिन अदालत माफीनामे पर...

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  • October 29, 2026 11:35 am IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली: शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने न्यायपालिका और भारत के मुख्य न्यायाधीश को लेकर की गई अपनी टिप्पणियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगी है। अदालत में दाखिल हलफनामे में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य न्यायपालिका की प्रतिष्ठा, स्वतंत्रता या अधिकारों को किसी भी तरह से नुकसान पहुंचाना नहीं था। हालांकि, सुनवाई के दौरान उनका माफीनामा अदालत के रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं होने और उनकी ओर से किसी वकील के उपस्थित न होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी, जब अदालत उनकी माफी पर विचार करेगी।

संजय राउत ने अपने हलफनामे में कहा कि वह न्यायपालिका की गरिमा और उसकी स्वतंत्रता के महत्व को समझते हैं। उन्होंने अपने बयानों पर खेद जताते हुए कहा कि उनका इरादा कभी भी अदालत का अपमान करना या न्यायिक संस्थान की प्रतिष्ठा को कम करना नहीं था। राउत ने अपने वक्तव्यों के लिए बिना शर्त, पूरी तरह और स्वेच्छा से माफी मांगी है। उनके हलफनामे का उद्देश्य अदालत को यह भरोसा दिलाना है कि वह न्यायपालिका के प्रति सम्मान रखते हैं और उनके बयानों को संस्था के अपमान के इरादे से नहीं देखा जाना चाहिए।

हलफनामे में राउत ने यह भी स्वीकार किया कि उनके कुछ बयान पर्याप्त पुष्टि और जरूरी सावधानी के बिना दिए गए थे। उन्होंने माना कि ऐसी टिप्पणियों से न्यायपालिका के संबंध में अनुचित धारणा बनने की संभावना पैदा हो सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह सुप्रीम कोर्ट की छवि को प्रभावित नहीं करना चाहते थे और न ही किसी न्यायाधीश की निष्पक्षता, स्वतंत्रता या न्यायिक अधिकारों पर सवाल खड़ा करना उनका उद्देश्य था।

राज्यसभा सांसद ने अदालत को यह आश्वासन भी दिया कि भविष्य में न्यायपालिका से जुड़े मामलों पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखते समय वह अधिक सतर्कता बरतेंगे। उन्होंने कहा कि किसी न्यायाधीश के आचरण या न्यायपालिका से संबंधित किसी विषय पर टिप्पणी करने से पहले तथ्यों की पूरी तरह पुष्टि करेंगे। उनके अनुसार, सार्वजनिक बयानों में संयम और जिम्मेदारी बनाए रखना जरूरी है, ताकि न्यायिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा को लेकर कोई गलतफहमी पैदा न हो।

इस मामले की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण स्थिति तब सामने आई, जब अदालत के संज्ञान में आया कि संजय राउत का माफीनामा रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था। इसके साथ ही सुनवाई के दौरान उनकी ओर से कोई अधिवक्ता भी पेश नहीं हुआ। इस परिस्थिति के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राउत को 17 नवंबर को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया। अब उनकी उपस्थिति में अदालत उनके हलफनामे और माफी के संबंध में आगे विचार कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल माफीनामे के बावजूद मामले का निपटारा अभी नहीं हुआ है। अदालत को यह तय करना है कि राउत की ओर से व्यक्त किया गया खेद और बिना शर्त माफी स्वीकार करने योग्य है या नहीं। इस संबंध में अंतिम निर्णय न्यायालय ही करेगा। 17 नवंबर की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि उस दिन अदालत माफीनामे पर विचार करने के साथ-साथ मामले में आगे की कार्रवाई को लेकर भी निर्णय ले सकती है।

संजय राउत महाराष्ट्र की राजनीति में सक्रिय प्रमुख नेताओं में शामिल हैं और शिवसेना (यूबीटी) की ओर से विभिन्न राजनीतिक तथा सार्वजनिक मुद्दों पर अपनी राय रखते रहे हैं। इस मामले में उनका हलफनामा न्यायपालिका के प्रति सम्मान जताने और अपने बयानों को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, माफी स्वीकार करना या आगे कोई कदम उठाना पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है। फिलहाल सभी की नजरें 17 नवंबर को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत इस मामले में अगला रुख स्पष्ट करेगी।

 

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