शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इस फैसले के कारण प्रदेश में रैक्सिल दवा की आपूर्ति एक ही फर्म के माध्यम से कराई गई। साथ ही दवा की कीमतों में कथित रूप से बढ़ोतरी करके सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये का भुगतान कराया गया। इस पूरे मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। आरोपों के आधार पर सीबीआई ने मामले की जांच शुरू की थी।हालांकि, लंबी जांच के बाद सीबीआई को आरोपों की पुष्टि करने वाले पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अधिकारियों के बीच किसी तरह की आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी या सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के ठोस प्रमाण सामने नहीं आए। इसके अलावा किसी अधिकारी को निजी आर्थिक लाभ पहुंचाए जाने का भी पर्याप्त सबूत नहीं मिला।
इसी आधार पर सीबीआई ने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करते हुए मामला बंद करने की सिफारिश की थी।जांच के दौरान वैज्ञानिक तथ्यों को भी महत्वपूर्ण माना गया। सीबीआई को पता चला कि वर्ष 2003 में कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने गेहूं की फसल को प्रभावित करने वाली तीन बीमारियों के उपचार के लिए रैक्सिल दवा के इस्तेमाल की सिफारिश की थी। यानी हरियाणा सरकार के फैसले से कई साल पहले ही कृषि वैज्ञानिकों की ओर से इस दवा को फसल के उपचार के लिए उपयोगी माना जा चुका था। जांच एजेंसी ने दूसरे राज्यों और संस्थानों में दवा की खरीद से संबंधित जानकारी भी जुटाई। जांच में सामने आया कि पंजाब स्टेट सीड कॉरपोरेशन और नेशनल सीड कॉरपोरेशन ने भी इसी कीमत पर रैक्सिल दवा खरीदी थी, जिस दर पर हरियाणा सीड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को इसकी आपूर्ति की गई थी।
इस तथ्य के आधार पर दवा की कीमत बढ़ाकर सरकारी धन का नुकसान करने का आरोप साबित नहीं हो सका। इस मामले में हरियाणा सरकार ने भी सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पर सहमति जताई थी। सरकार की ओर से अदालत में दिए गए बयान के मुताबिक, 20 मई को जारी पत्र के आधार पर जांच एजेंसी की रिपोर्ट स्वीकार किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं थी। सरकार के इस रुख के बाद अदालत के सामने क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने का रास्ता और स्पष्ट हो गया। अंततः पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने जांच एजेंसी की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए मामला बंद करने का आदेश दिया। इस फैसले से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और दो आईएएस अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है।रैक्सिल फफूंदनाशक से जुड़ा यह मामला हरियाणा की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में लंबे समय तक चर्चा का विषय रहा। अब सीबीआई जांच में पर्याप्त सबूत नहीं मिलने और अदालत द्वारा क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के बाद इस प्रकरण का कानूनी अध्याय समाप्त हो गया है।