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आत्मनिर्भर भारत की बड़ी उपलब्धि, 80 प्रतिशत स्वदेशी तकनीक से बना युद्धपोत नौसेना को सौंपा

GRSE जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रम इस लक्ष्य को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। स्वदेशी युद्धपोतों का निर्माण न केवल नौसेना की परिचालन क्षमता बढ़ाता है, बल्कि देश में तकनीकी विशेषज्ञता, अनुसंधान और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा देता है।

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Gauravshali Bharat News
  • November 6, 2026 10:00 pm IST, Published 42 minutes ago

नई दिल्ली: भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा और पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) ने स्वदेशी तकनीक से तैयार पनडुब्बी रोधी युद्धपोत ‘अमिनी’ भारतीय नौसेना को सौंप दिया है। इस युद्धपोत का निर्माण पूरी तरह देश में किया गया है। इसकी आपूर्ति से भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी, तटीय सुरक्षा और पानी के भीतर मौजूद खतरों से निपटने की क्षमता में इजाफा होगा।
अमिनी एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) श्रेणी का युद्धपोत है। इसे GRSE कोलकाता ने इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग (IRS) के निर्धारित वर्गीकरण नियमों के अनुरूप डिजाइन और विकसित किया है। यह पोत आधुनिक तकनीक और अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों से लैस है। इसे विशेष रूप से उथले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उनके संभावित खतरों का मुकाबला करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

भारतीय नौसेना के लिए इस युद्धपोत की खासियत इसमें लगाए गए आधुनिक हथियार और निगरानी उपकरण हैं। अमिनी में अत्याधुनिक हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी रॉकेट लॉन्चर और आधुनिक सोनार प्रणाली उपलब्ध कराई गई है। इन उपकरणों की मदद से समुद्र के भीतर संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाने और जरूरत पड़ने पर प्रभावी जवाब देने में मदद मिलेगी। सोनार प्रणाली पानी के अंदर मौजूद पनडुब्बियों और अन्य संभावित खतरों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

यह युद्धपोत केवल पनडुब्बी रोधी अभियानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय नौसेना की तटीय निगरानी और समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूती देगा। इसके अलावा समुद्री क्षेत्रों में बारूदी सुरंग बिछाने जैसी रणनीतिक गतिविधियों में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। आधुनिक समुद्री चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए इस पोत से नौसेना को विभिन्न परिस्थितियों में अभियान संचालित करने की अतिरिक्त क्षमता मिलेगी।

अमिनी नाम लक्षद्वीप के अमिनी द्वीप से लिया गया है। भारतीय नौसेना में जहाजों के नामकरण के दौरान ऐतिहासिक और भौगोलिक पहचान को महत्व देने की परंपरा रही है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस नए युद्धपोत को अमिनी नाम दिया गया है। यह पोत पूर्व में भारतीय नौसेना में शामिल आईएनएस अमिनी की अगली पीढ़ी के रूप में देखा जा रहा है। पुराना आईएनएस अमिनी पेट्या तृतीय श्रेणी का पनडुब्बी रोधी युद्धपोत था, जिसे वर्ष 2002 में नौसेना की सेवा से हटा दिया गया था।

नए अमिनी की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसका स्वदेशी निर्माण शामिल है। यह पोत 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी उपकरणों और तकनीक से तैयार किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत का घरेलू रक्षा उत्पादन क्षेत्र लगातार मजबूत हो रहा है। युद्धपोत में स्वदेशी तकनीक और उपकरणों के अधिक इस्तेमाल से विदेशी आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिलेगी। साथ ही देश के रक्षा उद्योग, इंजीनियरिंग क्षेत्र और स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

अमिनी की नौसेना को आपूर्ति को आत्मनिर्भर भारत अभियान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। केंद्र सरकार लगातार रक्षा क्षेत्र में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य आधुनिक सैन्य उपकरणों और युद्धपोतों के निर्माण में भारत की क्षमता विकसित करना है, ताकि देश अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर कम निर्भर रहे। GRSE जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रम इस लक्ष्य को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। स्वदेशी युद्धपोतों का निर्माण न केवल नौसेना की परिचालन क्षमता बढ़ाता है, बल्कि देश में तकनीकी विशेषज्ञता, अनुसंधान और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा देता है। कुल मिलाकर अमिनी का भारतीय नौसेना को सौंपा जाना समुद्री सुरक्षा और स्वदेशी रक्षा निर्माण के लिहाज से महत्वपूर्ण उपलब्धि है। आधुनिक हथियारों, सोनार तकनीक और 80 प्रतिशत से अधिक घरेलू सामग्री से तैयार यह युद्धपोत भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने के साथ आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को भी मजबूती प्रदान करेगा।


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