कांग्रेस सांसद ने अपने बयान में पश्चिमी हवाओं के रुख को लेकर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि उन्हें यह समझाने की जरूरत नहीं है कि हवाओं का पैटर्न किस तरह पराली का धुआं चंडीगढ़ को पार करते हुए दिल्ली तक पहुंचा देता है। उनके इस बयान को दिल्ली के प्रदूषण पर जारी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच पंजाब के किसानों के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। मनीष तिवारी ने कहा कि हर बार दिल्ली की हवा खराब होने पर पंजाब के किसानों को निशाना बनाया जाता है, जबकि प्रदूषण के पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। उन्होंने किसानों को बार-बार दोषी ठहराने की प्रवृत्ति पर आपत्ति जताई और कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए सभी संबंधित सरकारों को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।
सांसद ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से भी जवाबदेही तय करने की मांग की। उन्होंने कहा कि पंजाब के किसानों को हर बार बलि का बकरा बनाना उचित नहीं है। उनके अनुसार, अक्टूबर 2026 के अंत तक पंजाब में धान की लगभग 85 प्रतिशत कटाई पूरी हो चुकी थी। ऐसे में दिल्ली में प्रदूषण की स्थिति को समझने के लिए दूसरे कारणों का भी गंभीरता से विश्लेषण किया जाना चाहिए। उन्होंने दिल्ली में हर साल अक्टूबर के अंत से दिसंबर तक बिगड़ने वाली हवा को एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बताया। उनका कहना है कि राजधानी में प्रदूषण की समस्या लगातार बनी हुई है और इससे निपटने के लिए सरकारों को दीर्घकालिक और प्रभावी रणनीति तैयार करनी चाहिए। केवल पराली जलाने की घटनाओं पर ध्यान केंद्रित करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता।
दरअसल, दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों की शुरुआत के साथ वायु गुणवत्ता खराब होने लगती है। इस दौरान पराली का धुआं, वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल, औद्योगिक प्रदूषण और मौसम संबंधी परिस्थितियां हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं। ठंड के मौसम में हवा की गति कम होने और प्रदूषकों के वातावरण में फंसने से स्थिति और गंभीर हो जाती है।
ऐसे में मनीष तिवारी की टिप्पणी ने प्रदूषण के लिए जिम्मेदारी तय करने की बहस को नया मोड़ दे दिया है। उनका सवाल है कि जब चंडीगढ़ में हवा अपेक्षाकृत साफ रह सकती है, तो दिल्ली में प्रदूषण के लिए केवल पंजाब के किसानों को दोषी क्यों माना जाए? हालांकि, अलग-अलग शहरों में प्रदूषण का स्तर हवा की दिशा, स्थानीय उत्सर्जन और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए केवल AQI के एक दिन के आंकड़े से प्रदूषण के स्रोतों का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। अब देखना होगा कि केंद्र और दिल्ली सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती हैं। इतना स्पष्ट है कि दिल्ली के प्रदूषण का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक जांच, प्रभावी नीतियों और सभी संबंधित राज्यों के साझा प्रयासों से ही संभव है।