ओडिशा में ऐतिहासिक जीत के बाद अब पश्चिम बंगाल में भी भारतीय जनता पार्टी की मजबूत बढ़त ने एक नाम को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है वे है सुनील बंसल। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और दोनों राज्यों के प्रभारी बंसल को इस चुनावी सफलता का मुख्य आर्किटेक्ट माना जा रहा है। कुछ साल पहले तक पश्चिम बंगाल में बीजेपी का संगठन बेहद सीमित था। ज़मीनी स्तर पर पार्टी के पास न तो मजबूत कैडर था और न ही व्यापक जनाधार। लेकिन हालिया चुनावों में तस्वीर तेजी से बदली है। बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करना, स्थानीय नेताओं को आगे बढ़ाना और आक्रामक कैंपेन, इन सबका श्रेय बंसल की रणनीति को दिया जा रहा है।
इसी तरह ओडिशा में भी बीजेपी ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। लंबे समय से सत्ता में रही नवीन पटनायक की पकड़ को चुनौती देना आसान नहीं था, लेकिन बीजेपी ने सत्ता का समीकरण बदल दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठनात्मक मजबूती और माइक्रो-मैनेजमेंट इस बदलाव की कुंजी रहे।
बंगाल में बीजेपी की रणनीति बहु-स्तरीय रही, एक तरफ ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी को भुनाया गया, तो दूसरी ओर सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की गई। बूथ प्रबंधन, डेटा-आधारित चुनावी तैयारी और लगातार कार्यकर्ता संवाद ने पार्टी को नई ऊर्जा दी।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, बंसल का फोकस सिर्फ बड़े रैलियों पर नहीं बल्कि “पन्ना प्रमुख” जैसे सूक्ष्म संगठनात्मक ढांचे पर रहा। यही वजह है कि जहां पहले बीजेपी का झंडा उठाने वाला कोई नहीं दिखता था, वहां अब पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नजर आ रही है।
हालांकि, यह भी सच है कि बंगाल की राजनीति बेहद जटिल है और अंतिम नतीजे कई कारकों पर निर्भर करेंगे। लेकिन इतना तय है कि सुनील बंसल ने बीजेपी को उन राज्यों में प्रतिस्पर्धी बना दिया है, जहां कभी पार्टी हाशिये पर थी।