प. बंगाल विधानसभा चुनाव में 207 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत पाने वाली भाजपा ने राज्य में अपने पहले मुख्यमंत्री बने । 2021 और 2026 के विधानसभा चुनाव में ममता को शिकस्त देकर शुभेंदु ‘जॉयंट किलर’ साबित हुए हैं, शुभेंदु अधिकारी 9वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया।
आज ही गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती (रवींद्र जयंती) है। भाजपा ने इस दिन को चुनकर बंगाल की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है।
बचपन में रामकृष्ण मिशन जाने वाला लड़का कैसे बना बंगाल की राजनीति का बड़ा चेहरा
1970 में पूर्व मिदनापुर के कर्कुली गांव में जन्मे शुभेंदु अधिकारी का बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था। जहां दूसरे बच्चे खेल-कूद में वक्त बिताते थे, वहीं शुभेंदु का मन आध्यात्म और पूजा-पाठ में रमता था। हर शनिवार उनका रामकृष्ण मिशन जाना तय माना जाता था। धार्मिक झुकाव इतना गहरा था कि घरवालों को डर सताने लगा था कि कहीं बेटा संन्यासी न बन जाए।
परिवार के लोग तब हैरान रह जाते थे, जब घर में रखे सिक्के अचानक गायब मिलते और बाद में पता चलता कि शुभेंदु उन्हें चुपचाप मिशन में दान कर आए हैं। उनकी सोच, दिनचर्या और वैराग्य जैसी प्रवृत्ति देखकर घरवालों को लगता था कि वह कभी भी घर छोड़ सकते हैं।
लेकिन वक्त के साथ शुभेंदु ने जिंदगी के लिए एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने तय किया कि संन्यास नहीं, राजनीति करेंगे। और निजी जीवन को लेकर भी फैसला साफ था कि वे शादी नहीं करेंगे।
80 के दशक के आखिर में कांथी के प्रभात कुमार कॉलेज से उन्होंने छात्र राजनीति में कदम रखा। यहीं से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर। धीरे-धीरे पूर्व मेदिनीपुर की राजनीति में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई और फिर बंगाल की सियासत में एक मजबूत नाम बनकर उभरे।
राजनीति सफ़र
पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुभेंदु अधिकारी एक प्रभावशाली और चर्चित चेहरा बन चुके हैं। करीब 30 वर्षों से सक्रिय सार्वजनिक जीवन में उन्होंने जमीनी स्तर से लेकर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति तक अपनी मजबूत पहचान बनाई है। लंबे राजनीतिक अनुभव और संगठनात्मक पकड़ के कारण उन्हें पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ नेताओं में गिना जाता है।
शुभेंदु अधिकारी के पास 20 वर्षों से अधिक का विधायी अनुभव है। वह दो बार लोकसभा सांसद और तीन बार विधायक रह चुके हैं। विधानसभा और संसद दोनों सदनों में काम करने का अनुभव उन्हें एक अनुभवी राजनेता के रूप में स्थापित करता है। इसके अलावा उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा में पांच वर्षों तक नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली, जहां उन्होंने विपक्ष की आवाज को मजबूती से उठाया।
राजनीतिक जीवन के साथ-साथ उनके पास व्यापक प्रशासनिक अनुभव भी है। राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए उन्होंने परिवहन और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व किया। प्रशासनिक फैसलों और विकास कार्यों में उनकी सक्रिय भूमिका की लगातार चर्चा होती रही है। उन्होंने हुगली रिवर ब्रिज कमीशन के अध्यक्ष के रूप में भी अपनी सेवाएँ दीं और बुनियादी ढांचे से जुड़े कई कार्यों में योगदान दिया।

हल्दिया विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में एक दशक से अधिक समय तक काम करते हुए उन्होंने हल्दिया के औद्योगिक और शहरी विकास में अहम भूमिका निभाई। उनके कार्यकाल के दौरान क्षेत्र में कई विकास परियोजनाओं को गति मिली।
शुभेंदु अधिकारी सहकारी आंदोलन से भी लंबे समय तक जुड़े रहे हैं। उन्होंने कई सहकारी संस्थाओं और बैंकों में नेतृत्वकारी जिम्मेदारियाँ निभाईं। ग्रामीण बैंकिंग और स्थानीय विकास के क्षेत्र में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
उनका राजनीतिक सफर स्थानीय निकाय राजनीति से शुरू हुआ था। वह तीन बार पार्षद और कांथी नगर पालिका के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। स्थानीय स्तर से शुरुआत कर राज्य राजनीति में बड़ा चेहरा बनना उनके लंबे राजनीतिक संघर्ष और अनुभव को दर्शाता है।
शुभेंदु अधिकारी का परिवार पश्चिम बंगाल के कांथी क्षेत्र का प्रतिष्ठित अधिकारी परिवार माना जाता है, जिसका संबंध स्वतंत्रता आंदोलन से भी रहा है। परिवार के सदस्य बिपिन अधिकारी और केनाराम अधिकारी राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े थे और कई स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर काम करते थे। बताया जाता है कि देश के प्रति समर्पण के कारण बिपिन अधिकारी को जेल भी जाना पड़ा था। ब्रिटिश शासन के दौरान अधिकारी परिवार के घर को दो बार आग के हवाले किए जाने की घटनाएँ भी इतिहास का हिस्सा मानी जाती हैं।

लंबे राजनीतिक अनुभव, प्रशासनिक क्षमता और मजबूत जनाधार के कारण शुभेंदु अधिकारी आज पश्चिम बंगाल की राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं और राज्य की राजनीति में उनकी भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है।