दूध खत्म, जिम्मेदारी खत्म: कचरे में जीवन तलाशती गायें
दूध खत्म, जिम्मेदारी खत्म: कचरे में जीवन तलाशती गायें
भारत में गाय को आस्था, संस्कृति और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मंचों से लेकर राजनीतिक भाषणों तक “गौ माता” के नाम पर भावनाएँ दिखाई जाती हैं। लेकिन देश के ज्यादातर शहरों और कस्बों की सच्चाई इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। सुबह होते ही सड़कों, बाजारों और कूड़े के ढेरों में […]
भारत में गाय को आस्था, संस्कृति और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मंचों से लेकर राजनीतिक भाषणों तक “गौ माता” के नाम पर भावनाएँ दिखाई जाती हैं। लेकिन देश के ज्यादातर शहरों और कस्बों की सच्चाई इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। सुबह होते ही सड़कों, बाजारों और कूड़े के ढेरों में भोजन तलाशती गायें इस बात का प्रमाण बन चुकी हैं कि समाज ने श्रद्धा को केवल शब्दों तक सीमित कर दिया है।
शहरों में एक आम दृश्य अब बेहद चिंताजनक बन चुका है। दूध निकालने के बाद कई पशुपालक अपने पशुओं को खुले में छोड़ देते हैं। इसके बाद ये गायें गलियों और कूड़े के ढेरों में खाने की तलाश करती हैं। सड़ी-गली सब्जियाँ, प्लास्टिक की थैलियाँ, मेडिकल कचरा और जहरीला अपशिष्ट इनके पेट में पहुंचता है। पशु चिकित्सकों के अनुसार कई मामलों में गायों के पेट से ऑपरेशन के दौरान कई किलो प्लास्टिक निकाला गया है, लेकिन इसके बावजूद हालात में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता।
सबसे गंभीर सवाल पशुपालकों की जिम्मेदारी को लेकर उठता है। जब तक पशु दूध देता है, तब तक उसकी देखभाल होती है, लेकिन जैसे ही उपयोग खत्म होता है, उसे सड़कों पर छोड़ दिया जाता है। यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पशुओं के प्रति क्रूरता का उदाहरण माना जा रहा है। जिस पशु से परिवार की आय चलती है, उसी को भूख और गंदगी के भरोसे छोड़ देना समाज की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
स्थिति अब केवल पशुओं तक सीमित नहीं रह गई है। शहरों में बढ़ते आवारा पशु सड़क दुर्घटनाओं का भी बड़ा कारण बन रहे हैं। रात के समय अचानक सड़क पर आ जाने वाले पशु कई बार जानलेवा हादसों की वजह बनते हैं। इसके अलावा खुले कूड़े के ढेर संक्रमण, बदबू और बीमारियों को भी बढ़ा रहे हैं। बारिश के दौरान यही कचरा नालियों को जाम कर जलभराव और महामारी जैसी स्थिति पैदा करता है।
नगर निगम और प्रशासन समय-समय पर अभियान चलाने का दावा करते हैं, लेकिन समस्या की जड़ तक कार्रवाई कम ही पहुंचती है। कुछ पशुओं को पकड़कर गौशालाओं में भेज दिया जाता है, लेकिन सड़कों पर बेसहारा पशुओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि गौशालाओं और पशु संरक्षण के नाम पर खर्च होने वाला धन आखिर कितना प्रभावी साबित हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या का समाधान केवल भावनात्मक नारों से संभव नहीं है। पशुपालकों की जवाबदेही तय करनी होगी। हर पशु का पंजीकरण अनिवार्य किया जाए और पशु को सड़क पर छोड़ने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाए। साथ ही शहरों में आधुनिक कचरा प्रबंधन प्रणाली लागू करना भी जरूरी है ताकि पशु प्लास्टिक और जहरीले कचरे तक न पहुंच सकें।
सामाजिक स्तर पर भी बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। सड़क पर कचरा फेंकना, प्लास्टिक खुले में छोड़ना और हर समस्या के लिए केवल प्रशासन को जिम्मेदार ठहराना स्थिति को और खराब बना रहा है। स्वच्छ और सुरक्षित शहर केवल सरकारी योजनाओं से नहीं बल्कि नागरिक जिम्मेदारी से भी बनते हैं।
आज कूड़े में भोजन तलाशती गायें केवल बदहाल व्यवस्था की तस्वीर नहीं हैं, बल्कि यह समाज के बदलते चरित्र और घटती संवेदनशीलता का भी संकेत हैं। जब तक पशुओं के प्रति जिम्मेदारी और वास्तविक करुणा व्यवहार में नहीं दिखाई देगी, तब तक “गौ संरक्षण” केवल नारों और भाषणों तक सीमित रहेगा।