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10 मई  जब रंगभेद हारा और इंसानियत जीती, कैदी नंबर से राष्ट्रपति भवन तक

10 मई 1994… यह सिर्फ एक तारीख नहीं थी, बल्कि इंसानी इतिहास का वह क्षण था जब सदियों से दबाई गई एक आवाज सत्ता के सबसे ऊँचे मंच तक पहुँची। यह वह दिन था जब नेल्सन मंडेला ने  दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और दुनिया को यह एहसास कराया […]

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Gauravshali Bharat News
  • May 10, 2026 4:03 pm IST, Published 2 days ago

10 मई 1994… यह सिर्फ एक तारीख नहीं थी, बल्कि इंसानी इतिहास का वह क्षण था जब सदियों से दबाई गई एक आवाज सत्ता के सबसे ऊँचे मंच तक पहुँची। यह वह दिन था जब नेल्सन मंडेला ने  दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और दुनिया को यह एहसास कराया कि अन्याय चाहे कितना भी ताकतवर क्यों न हो, इंसान की आज़ादी और सम्मान की इच्छा उससे कहीं ज्यादा बड़ी होती है।

उस दिन पूरी दुनिया की नजरें दक्षिण अफ्रीका पर टिकी थीं। लाखों लोग टीवी स्क्रीन पर एक ऐसे इंसान को देख रहे थे, जिसने अपने जीवन के 27 साल जेल की अंधेरी कोठरी में बिताए, लेकिन फिर भी उसके दिल में नफरत नहीं थी। वह जेल से टूटा हुआ इंसान बनकर नहीं निकला, बल्कि एक ऐसे नेता के रूप में सामने आया जिसने अपने देश को बदले की आग से बचाकर मेल-मिलाप और लोकतंत्र की राह दिखाई। नेल्सन मंडेला का राष्ट्रपति बनना केवल राजनीतिक बदलाव नहीं था। यह इंसानियत की जीत थी। यह उस सोच की हार थी, जो किसी इंसान की कीमत उसकी त्वचा के रंग से तय करती थी।

दक्षिण अफ्रीका में उस समय “अपार्थाइड” यानी रंगभेद की नीति लागू थी। यह सिर्फ एक कानून नहीं था, बल्कि पूरी व्यवस्था थी, जिसमें गोरे और अश्वेत लोगों के लिए अलग-अलग दुनिया बना दी गई थी। गोरे लोग सत्ता, जमीन, शिक्षा और संसाधनों पर कब्जा रखते थे, जबकि अश्वेत नागरिकों को उनके ही देश में दूसरे दर्जे का इंसान समझा जाता था।

अश्वेतों को वोट देने का अधिकार नहीं था। वे कई सार्वजनिक स्थानों पर नहीं जा सकते थे। स्कूल अलग थे, अस्पताल अलग थे, बसों में सीटें अलग थीं और यहां तक कि इंसानी रिश्तों पर भी रंग का पहरा लगा हुआ था। इसी अन्याय के खिलाफ एक युवा वकील ने आवाज उठाई। वह युवा था नेल्सन मंडेला। उन्होंने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस यानी African National Congress के साथ मिलकर रंगभेद के खिलाफ आंदोलन शुरू किया।

मंडेला जानते थे कि यह लड़ाई आसान नहीं होगी। सत्ता के पास पुलिस थी, सेना थी, कानून था और ताकत थी। लेकिन मंडेला के पास जनता का विश्वास था। धीरे-धीरे उनकी आवाज पूरी दुनिया तक पहुँचने लगी।

सरकार ने उन्हें चुप कराने की कोशिश की। उन पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए। आखिरकार 1964 में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। अदालत में मंडेला ने जो कहा, वह इतिहास बन गया। उन्होंने कहा था—“मैंने एक ऐसे लोकतांत्रिक और स्वतंत्र समाज का सपना देखा है, जहाँ सभी लोग बराबरी और सम्मान के साथ रह सकें। अगर जरूरत पड़ी, तो मैं इस सपने के लिए मरने को भी तैयार हूँ।”

इसके बाद उन्हें रॉबेन आइलैंड की जेल भेज दिया गया। वहाँ उन्हें कठोर मजदूरी करनी पड़ती थी। छोटी सी कोठरी, पतली चटाई और सीमित खाना—यही उनकी दुनिया बन गई थी। कई बार उन्हें मानसिक और शारीरिक यातनाएँ भी दी गईं।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि जेल उनकी सोच को कैद नहीं कर सकी। 27 साल तक कैद में रहने के बावजूद मंडेला के भीतर नफरत नहीं पनपी। वे जानते थे कि अगर आजादी के बाद बदले की राजनीति शुरू हुई, तो दक्षिण अफ्रीका गृहयुद्ध में बदल जाएगा। इसलिए उन्होंने अपने संघर्ष को सिर्फ सत्ता हासिल करने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज को जोड़ने की कोशिश की।

1990 में जब वे जेल से बाहर आए, तब पूरी दुनिया ने उन्हें एक क्रांतिकारी नेता के रूप में देखा। लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। लेकिन मंडेला ने अपने पहले भाषण में बदले की नहीं, शांति और लोकतंत्र की बात की। चार साल बाद 10 मई 1994 को वे दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने। शपथ ग्रहण समारोह में दुनिया के कई बड़े नेता मौजूद थे। लेकिन उस दिन सबसे बड़ा दृश्य यह था कि वही देश, जिसने कभी उन्हें आतंकवादी कहा था, अब उन्हें अपना राष्ट्रपति मान रहा था।

अपने ऐतिहासिक संबोधन में मंडेला ने कहा था कि, “घावों को भरने का समय आ गया है। वह समय आ गया है जब हम विभाजन की दीवारों को तोड़कर एक नए दक्षिण अफ्रीका का निर्माण करें।” यह सिर्फ भाषण नहीं था, बल्कि राजनीति को इंसानियत से जोड़ने की घोषणा थी। मंडेला चाहते तो अपने विरोधियों से बदला ले सकते थे। वे चाहते तो गोरी सरकारों के खिलाफ कठोर कदम उठा सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कहा कि अगर दक्षिण अफ्रीका को आगे बढ़ना है, तो उसे नफरत नहीं, बल्कि विश्वास की जरूरत है।

उन्होंने “सत्य और मेल-मिलाप आयोग” बनाया, ताकि रंगभेद के दौरान हुए अपराधों को सामने लाया जा सके और समाज सच स्वीकार कर आगे बढ़ सके। यह दुनिया के इतिहास में अनोखा प्रयोग था, जहाँ बदले की जगह संवाद को चुना गया। मंडेला ने यह भी समझा कि केवल राजनीतिक आजादी काफी नहीं होती। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और गरीबों के अधिकारों पर जोर दिया। वे मानते थे कि लोकतंत्र का असली मतलब तभी पूरा होगा, जब समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति भी सम्मान के साथ जी सके।

उनकी राजनीति सत्ता के अहंकार की राजनीति नहीं थी। वे राष्ट्रपति बनने के बाद भी आम लोगों से उसी सादगी से मिलते थे। उनके भीतर कोई कटुता नहीं थी। यही वजह थी कि वे सिर्फ दक्षिण अफ्रीका के नेता नहीं रहे, बल्कि पूरी दुनिया में इंसानियत, धैर्य और लोकतंत्र के प्रतीक बन गए। आज जब दुनिया जाति, धर्म, नस्ल और भाषा के नाम पर बंटती दिखाई देती है, तब नेल्सन मंडेला की कहानी और ज्यादा प्रासंगिक हो जाती है। वे हमें सिखाते हैं कि सबसे कठिन संघर्ष वह नहीं होता जो सड़कों पर लड़ा जाए, बल्कि वह होता है जिसमें इंसान अपने भीतर की नफरत को हराता है।

मंडेला ने दुनिया को दिखाया कि जेल इंसान के शरीर को कैद कर सकती है, लेकिन उसके विचारों और सपनों को नहीं। उन्होंने यह साबित किया कि महान नेता वही होता है, जो अपने लोगों को डर और बदले की राजनीति से बाहर निकालकर उम्मीद और एकता की राह दिखाए। 10 मई 1994 को जब मंडेला ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली, तब सिर्फ एक सरकार नहीं बदली थी। उस दिन इंसानियत ने रंगभेद पर जीत हासिल की थी। उस दिन दुनिया ने देखा था कि इतिहास का सबसे मजबूत जवाब बंदूक नहीं, बल्कि धैर्य, क्षमा और लोकतंत्र हो सकता है।

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