केरलम में कांग्रेस ने वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री चुनकर केवल एक नेता का चयन नहीं किया है बल्कि उसने अपनी सबसे पुरानी राजनीतिक बीमारी मुख्यमंत्री चयन की अनिश्चितता और अंतहीन गुटबाज़ी से बाहर निकलने की कोशिश की है। UDF को 140 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटों का प्रचंड जनादेश मिला। कांग्रेस अकेले 63 सीटें जीतकर गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी। इसके बावजूद मुख्यमंत्री तय करने में करीब दस दिन लग गए और अंततः वीडी सतीशन को के.सी. वेणुगोपाल तथा रमेश चेन्निथला पर प्राथमिकता दी गई। यह बताता है कि फैसला केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि गहरी रणनीतिक और ऐतिहासिक सोच के साथ लिया गया।
विडंबना देखिए कि 2011 में जब केरल में कांग्रेस सरकार बनी तो रमेश चेनिथाला के दावे को दरकिनार करके वरिष्ठ ओमन चांडी को सीएम बनाया गया। तब वरिष्ठता का तर्क चला। जबकि इस बार रमेश सबसे वरिष्ठ हैं तो नए नेतृत्व को मौक़ा देने का तर्क देकर सतीशन की ताजपोशी की गई है।
केरलम कांग्रेस का इतिहास
केरलम कांग्रेस के इतिहास को देखें तो यह स्थिति नयी नहीं है। 1960 में भी कांग्रेस 63 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, लेकिन मुख्यमंत्री कांग्रेस का नहीं बना। कांग्रेस-PSP-मुस्लिम लीग की “मुक्कूटु मुन्नानी” सरकार में PSP नेता पट्टम ए. थानु पिल्लै मुख्यमंत्री बने और आर. शंकर उपमुख्यमंत्री। वजह वही थी जो कांग्रेस की पुरानी कमजोरी रही है… जातीय-सामाजिक संतुलन, सहयोगियों का दबाव और अपने नेताओं के बीच अविश्वास। अंततः दिल्ली को हस्तक्षेप करना पड़ा और 1962 में आर. शंकर केरल के पहले कांग्रेस मुख्यमंत्री बने।
लेकिन तब भी स्थिरता नहीं आई। पी.टी. चाको विवाद, अंदरूनी विद्रोह और कांग्रेस विधायकों की बगावत ने सरकार गिरा दी। बाद में इन्हीं असंतुष्टों से केरलम कांग्रेस जैसी ताकत उभरी। यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 1960 के दशक में भी कांग्रेस की 63 सीटें उसकी अंदरूनी लड़ाइयों के सामने कमजोर पड़ गई थीं। 2026 में वही संख्या फिर लौटी, लेकिन इस बार कांग्रेस ने लंबे मंथन के बाद सतीशन पर फैसला लेकर उस अभिशप्त स्मृति को तोड़ने की कोशिश की है। इसमें मल्लिकार्जुन खड़गे के अनुभव और संगठनात्मक संतुलन की बड़ी भूमिका दिखाई देती है।
केरलम में कांग्रेस की राजनीति हमेशा सीधी रेखा में नहीं चली। 1970 में कांग्रेस सत्ता में लौटी, लेकिन मुख्यमंत्री सी. अच्युत मेनन बने, जबकि कांग्रेस उनसे कहीं बड़ी पार्टी थी। 1977 में के. करुणाकरण मुख्यमंत्री बने, मगर राजन केस के दबाव में एक महीने के भीतर हटना पड़ा। तब कांग्रेस ने अचानक 37 वर्षीय ए.के. एंटनी को आगे किया, जो उस समय विधायक भी नहीं थे। यह केरल कांग्रेस की विशिष्ट शैली रही है । संकट के समय समझौता, नैतिक छवि और दिल्ली के फैसले का मिश्रण।

1982 में करुणाकरण ने स्थिर सरकार दी और पूरा कार्यकाल पूरा किया। 1995 में ISRO जासूसी केस और गुटीय संघर्ष ने उन्हें हटाया तो एंटनी फिर लौटे। 2001 में UDF को भारी बहुमत मिला, लेकिन एंटनी को 2004 लोकसभा चुनाव की हार के बाद इस्तीफा देना पड़ा और ओमन चांडी मुख्यमंत्री बने। दिलचस्प यह था कि चांडी का नाम खुद एंटनी ने आगे बढ़ाया। इस पूरी यात्रा में कांग्रेस कई बार सत्ता में आई, लेकिन मुख्यमंत्री पद पर कुछ ही चेहरे बार-बार लौटते रहे जैसे आर. शंकर, करुणाकरण, एंटनी और ओमन चांडी। इनमें भी पूर्ण पांच साल का कार्यकाल केवल करुणाकरण और चांडी ही पूरा कर पाए।
इसी पृष्ठभूमि में वीडी सतीशन का चयन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। वे केवल एक और कांग्रेस नेता नहीं हैं, बल्कि करुणाकरण-एंटनी-चांडी युग के बाद उभरता हुआ नया केंद्रीय चेहरा हैं। 61 वर्षीय सतीशन एर्नाकुलम जिले की परवूर सीट से लगातार छठी बार विधायक चुने गए हैं। कानून की पढ़ाई करने वाले सतीशन NSUI से राजनीति में आए और विधानसभा में आक्रामक, तथ्यपूर्ण और धारदार बहसों के कारण पहचान बनाई। 2021 में कांग्रेस की हार के बाद जब पार्टी का मनोबल टूट चुका था, तब उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। वही फैसला अब मुख्यमंत्री पद तक पहुंच गया है।
कांग्रेस ने वेणुगोपाल की जगह सतीशन पर दांव लगाया
सतीशन की सबसे बड़ी ताकत यह रही कि उन्होंने पिनराई विजयन जैसे मजबूत मुख्यमंत्री को लगातार चुनौती दी। भ्रष्टाचार, सत्ता के केंद्रीकरण और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों पर उन्होंने कांग्रेस को फिर से आक्रामक बनाया। उन्होंने बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय किया, जिला नेताओं के साथ लगातार संवाद रखा और चुनाव अभियान में खुद को पूरे राज्य का चेहरा बना दिया। वे केवल क्षेत्रीय नेता नहीं रहे बल्कि वे UDF के संघर्ष और उम्मीद का सार्वजनिक चेहरा बन गए।

वहीं के.सी. वेणुगोपाल की तुलना में सतीशन का चयन इसलिए अधिक स्वाभाविक माना गया क्योंकि वे ज़मीन से निकले नेता हैं। वेणुगोपाल राष्ट्रीय राजनीति में अत्यंत प्रभावशाली हैं और राहुल गांधी-खड़गे नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं, लेकिन 2009 के बाद उनका अधिकांश समय दिल्ली की राजनीति में बीता। राज्य कांग्रेस के भीतर बड़ी संख्या में नेताओं को लगता था कि वे “स्थानीय जनादेश का स्वाभाविक चेहरा” नहीं हैं। दूसरी तरफ सतीशन नेता प्रतिपक्ष थे और चुनावी अभियान का चेहरा भी। केरल की राजनीति में नेता प्रतिपक्ष को अक्सर भावी मुख्यमंत्री माना जाता रहा है।
वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनाने की राजनीतिक लागत भी कम नहीं थी। वे लोकसभा सांसद हैं, मुख्यमंत्री बनने पर पहले लोकसभा उपचुनाव और फिर विधानसभा में प्रवेश के लिए दूसरा उपचुनाव कराना पड़ता। साथ ही कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर संगठन महासचिव जैसे अहम पद के लिए नया चेहरा भी खोजना पड़ता। ऐसे समय में, जब कांग्रेस केरलम को अपने सबसे मजबूत राज्यों में गिन रही है, दिल्ली के नेता को थोपना “हाईकमान बनाम जनादेश” की बहस खड़ी कर सकता था।
रमेश चेन्निथला अनुभवी और वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन 2021 में उनके नेतृत्व में UDF सत्ता में नहीं लौट सकी थी। इसलिए पार्टी के भीतर यह भावना थी कि अब भविष्य की राजनीति के लिए नया चेहरा चाहिए। सतीशन में उम्र, आक्रामकता, वैचारिक स्पष्टता और अगले डेढ़ दशक की राजनीति का संयोजन दिखाई देता है। केरल की राजनीति में नेता “महानायक” नहीं होता, बल्कि “first among equals” होता है और फिलहाल सतीशन उसी भूमिका में फिट बैठते हैं।
सतीशन के चयन का सामाजिक संदेश भी गहरा है। उन्होंने समुदाय-आधारित दबावों के सामने अपेक्षाकृत सख्त रुख रखा, ध्रुवीकरण के खिलाफ स्पष्ट सेक्युलर स्टैंड लिया और सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश की। IUML जैसे सहयोगियों से उन्हें सकारात्मक संकेत मिले, हालांकि NSS ने सहयोगी दलों के दबाव पर आपत्ति भी जताई। इससे साफ है कि यह फैसला केवल कांग्रेस का आंतरिक निर्णय नहीं, बल्कि UDF गठबंधन की भविष्य दिशा का संकेत भी है।
असल सवाल अब शुरू होता है। क्या सतीशन कांग्रेस के गुटों को साथ रख पाएंगे? क्या वे IUML और केरलम कांग्रेस जैसे सहयोगियों को संतुलित कर पाएंगे? क्या 102 सीटों की इस विराट जीत को वे स्थिर, ईमानदार और आधुनिक प्रशासन में बदल पाएंगे? कांग्रेस ने इस बार संकट का समाधान खोज लिया है, लेकिन अब सतीशन को साबित करना होगा कि वे सिर्फ समझौते का चेहरा नहीं, बल्कि केरलम कांग्रेस के नए युग की शुरुआत हैं।
इस फैसले का असर केवल केरल तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत राजस्थान के लिए भी है। अगर 2028 में कांग्रेस सत्ता में आती है और तब तक गोविंद सिंह डोटासरा प्रदेश अध्यक्ष बने रहते हैं, तो मुख्यमंत्री पद की दौड़ स्वाभाविक रूप से प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के इर्द-गिर्द सिमट जाएगी। यानी गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली जैसे चेहरे सबसे आगे दिखाई देंगे। किसी तीसरे नेता के अचानक उभरने की संभावना उतनी ही कम होगी, जितनी केरलम में के.सी. वेणुगोपाल के लिए हो गई।
यही कारण है कि अब राजस्थान कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान और तेज होगी। डोटासरा यदि लंबे समय तक प्रदेश अध्यक्ष पद बचाए रखते हैं तो वही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक जीत मानी जाएगी। लेकिन अगर कांग्रेस चुनाव से ठीक पहले नेतृत्व बदलती है, तो हालात सनी जोसेफ जैसे नेताओं की स्थिति की तरह हो सकते हैं, जहां संगठन में मौजूद होने के बावजूद निर्णायक क्षण हाथ से निकल जाता है।
कुल मिलाकर, कांग्रेस का यह फैसला केवल मुख्यमंत्री चयन नहीं है बल्कि यह पार्टी की भविष्य राजनीति का संकेत है। संदेश साफ है, जो नेता राज्य की जमीन पर संघर्ष करेगा, संगठन संभालेगा, चुनाव में चेहरा बनेगा और लगातार जनता के बीच रहेगा, वही भविष्य का स्वाभाविक दावेदार होगा। आज अगर के.सी. वेणुगोपाल जैसे ताकतवर नेता को भी पीछे रहना पड़ा है, तो यह समझ लेना चाहिए कि कांग्रेस की राजनीति में अब केवल दिल्ली की निकटता काफी नहीं होगी बल्कि राज्य की जमीन पर स्वीकृति और जनाधार ही अंतिम कसौटी बनेगा।