भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वीर क्रांतिकारियों के अद्भुत साहस और बलिदान से भरा पड़ा है। इन्हीं अमर सेनानियों में एक नाम है अमर शहीद करतार सिंह सराभा का, जिन्होंने महज 19 वर्ष की आयु में देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आज उनकी जयंती पर पूरा देश इस महान क्रांतिकारी को श्रद्धापूर्वक नमन कर रहा है।
पंजाब की धरती पर जन्मे करतार सिंह सराभा का जीवन भले ही छोटा रहा, लेकिन उनका संघर्ष और बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हमेशा के लिए अमर हो गया। इतिहासकारों के अनुसार, वे उन चुनिंदा युवाओं में थे जिन्होंने बहुत कम उम्र में अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दे दी थी।
करतार सिंह सराभा का जन्म 24 मई 1896 को पंजाब के लुधियाना जिले के सराभा गांव में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया था, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनके दादा ने किया। शुरुआती शिक्षा गांव और लुधियाना में पूरी करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए। लेकिन विदेश की धरती पर पहुंचते ही उनके भीतर देशभक्ति की भावना और अधिक प्रबल हो गई।
उस दौर में अमेरिका और कनाडा में रह रहे भारतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव किया जाता था। भारतीयों को हीन दृष्टि से देखा जाता था। इन घटनाओं ने युवा करतार सिंह को भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने महसूस किया कि जब तक भारत अंग्रेजों का गुलाम रहेगा, तब तक भारतीयों को दुनिया में सम्मान नहीं मिलेगा। यही सोच उन्हें क्रांतिकारी रास्ते की ओर ले गई।
अमेरिका में ही वे प्रसिद्ध गदर पार्टी से जुड़े। गदर पार्टी का गठन विदेशों में रह रहे भारतीयों ने ब्रिटिश शासन को खत्म करने के उद्देश्य से किया था। करतार सिंह बहुत जल्द इस संगठन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में शामिल हो गए। वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे, बल्कि एक प्रभावशाली लेखक, वक्ता और संगठक भी थे।
गदर पार्टी द्वारा प्रकाशित होने वाले “गदर” अखबार के संपादन, लेखन और वितरण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे युवाओं को देशभक्ति का संदेश देते हुए कहते थे कि गुलामी इंसान के आत्मसम्मान को खत्म कर देती है और इसे समाप्त करने के लिए बलिदान देना ही पड़ेगा।
साल 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद गदर पार्टी ने भारत में अंग्रेजों के खिलाफ बड़े विद्रोह की योजना बनाई। इस योजना के तहत विदेशों में रह रहे कई भारतीय क्रांतिकारी भारत लौटे। करतार सिंह सराभा भी भारत आए और पंजाब समेत कई इलाकों में जाकर भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित करने लगे।
हालांकि, अंग्रेज सरकार को इस क्रांति की भनक लग गई। एक मुखबिर की सूचना के बाद कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद अंग्रेजों ने प्रसिद्ध “लाहौर षड्यंत्र केस” चलाया, जिसमें करतार सिंह सराभा को मुख्य आरोपियों में शामिल किया गया।
बताया जाता है कि अदालत में भी उनके चेहरे पर डर नहीं था। उन्होंने गर्व के साथ अपने क्रांतिकारी विचारों को स्वीकार किया। अंग्रेज जज तक उनके आत्मविश्वास और निडरता से प्रभावित हो गए थे। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें बेहद खतरनाक क्रांतिकारी बताया था, क्योंकि इतनी कम उम्र में भी वे युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित कर रहे थे।
अंततः 16 नवंबर 1915 को लाहौर सेंट्रल जेल में करतार सिंह सराभा को फांसी दे दी गई। उस समय उनकी उम्र केवल 19 वर्ष थी। कहा जाता है कि वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे।
करतार सिंह सराभा का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर भी गहराई से पड़ा। महान क्रांतिकारी भगत सिंह उन्हें अपना आदर्श मानते थे। कई ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार भगत सिंह अपनी जेब में हमेशा करतार सिंह सराभा की तस्वीर रखते थे और उन्हें अपना प्रेरणास्रोत बताते थे।
आज भी देशभर में करतार सिंह सराभा को अदम्य साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनकी जयंती केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि युवाओं के लिए प्रेरणा का दिन भी है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि देश के सम्मान और स्वतंत्रता के लिए उम्र नहीं, बल्कि हौसला मायने रखता है।