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नेपाल में बालेन सरकार पर बढ़ते सवाल: 100 में से 88 वादे अधूरे, दो महीने में ही भरोसे की परीक्षा

काठमांडू: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने जब 27 मार्च को देश की बागडोर संभाली थी, तब उन्हें परिवर्तन, पारदर्शिता और नई राजनीति के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा था। युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता और पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग छवि ने लोगों में नई उम्मीद जगाई थी। लेकिन सत्ता संभालने के महज […]

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  • May 29, 2026 12:52 pm IST, Published 7 hours ago

काठमांडू: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने जब 27 मार्च को देश की बागडोर संभाली थी, तब उन्हें परिवर्तन, पारदर्शिता और नई राजनीति के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा था। युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता और पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग छवि ने लोगों में नई उम्मीद जगाई थी। लेकिन सत्ता संभालने के महज दो महीने बाद ही उनकी सरकार को गंभीर चुनौतियों और बढ़ती आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी प्रगति ट्रैकर के अनुसार, सरकार के 100 प्रमुख वादों में से 88 अभी भी निर्धारित समयसीमा से पीछे चल रहे हैं। इसके साथ ही सरकार बनने के पहले महीने के भीतर ही दो मंत्रियों के इस्तीफे ने प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक चयन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शुरुआती उत्साह के बाद बढ़ी निराशा

बालेन शाह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद 100 सूत्रीय सुधार कार्यक्रम की घोषणा की थी। इस कार्यक्रम में सरकारी ढांचे में सुधार, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई, प्रशासनिक जवाबदेही, डिजिटल सेवाओं का विस्तार और आर्थिक सुधारों जैसे कई महत्वाकांक्षी लक्ष्य शामिल थे।

हालांकि, इन वादों को लागू करने के लिए सरकार ने कई मामलों में 24 घंटे, 7 दिन और 15 दिन जैसी बेहद कम समयसीमाएं तय कर दीं। विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में बड़े प्रशासनिक बदलावों के लिए कानूनी, संवैधानिक और संस्थागत प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। ऐसे में अत्यधिक महत्वाकांक्षी समयसीमा निर्धारित करना सरकार की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जनता को तत्काल परिणाम दिखाने की कोशिश में सरकार ने जमीनी वास्तविकताओं का पर्याप्त आकलन नहीं किया, जिसके कारण अधिकांश योजनाएं शुरुआती चरण में ही अटक गईं।

मंत्रियों के इस्तीफे ने बढ़ाई मुश्किलें

सरकार के गठन के कुछ ही समय बाद दो वरिष्ठ मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा। एक मंत्री पर परिवार के सदस्य को अनुचित लाभ पहुंचाने का आरोप लगा, जबकि दूसरे मंत्री विवादित कारोबारी संबंधों के कारण जांच के घेरे में आ गए।

इन घटनाओं ने सरकार की साख को नुकसान पहुंचाया है। खासकर इसलिए क्योंकि बालेन शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान साफ-सुथरे प्रशासन और जवाबदेह शासन का वादा किया था। विपक्षी दलों का कहना है कि यदि सरकार स्वयं अपने मंत्रियों के चयन में पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं कर पा रही है, तो सुधारों के बड़े दावे खोखले साबित होंगे।

युवाओं में बढ़ रहा असंतोष

बालेन शाह की राजनीति का सबसे मजबूत आधार युवा वर्ग माना जाता है। काठमांडू के मेयर के रूप में उनके कार्यकाल ने बड़ी संख्या में युवाओं को आकर्षित किया था। यही समर्थन बाद में राष्ट्रीय राजनीति में उनकी ताकत बना।

लेकिन अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और सार्वजनिक चर्चाओं में युवाओं के बीच निराशा दिखाई देने लगी है। कई युवा सवाल उठा रहे हैं कि यदि नई राजनीतिक ताकतें भी पुराने ढर्रे पर चलेंगी, तो बदलाव की उम्मीद कैसे पूरी होगी।

विशेषज्ञ मानते हैं कि युवाओं की अपेक्षाएं बहुत अधिक थीं और सरकार की शुरुआती असफलताओं ने उस उत्साह को काफी हद तक प्रभावित किया है।

संसद और पार्टी के भीतर भी उठ रहे सवाल

सरकार को केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के भीतर से भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से सरकार की जवाबदेही और संसद में सक्रियता पर सवाल उठाए हैं।

आलोचकों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर संसद में अपेक्षित जवाब नहीं दिए। विपक्ष लगातार मांग कर रहा है कि प्रधानमंत्री सदन में उपस्थित होकर सरकार की नीतियों और निर्णयों पर स्पष्ट जवाब दें।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद और जवाबदेही किसी भी सरकार की विश्वसनीयता के लिए जरूरी होती है। ऐसे में संसद से दूरी सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है।

अध्यादेशों के जरिए शासन पर विवाद

बालेन सरकार के कई फैसले अध्यादेशों के माध्यम से लागू किए गए। इनमें सरकारी संस्थानों में राजनीतिक गतिविधियों को सीमित करने और कुछ संगठनों की भूमिका को नियंत्रित करने जैसे प्रस्ताव शामिल थे।

हालांकि, इन फैसलों को लेकर व्यापक बहस छिड़ गई। कर्मचारी संगठनों, छात्र समूहों और विपक्षी दलों ने इन कदमों का विरोध किया। मामला अदालत तक पहुंचा और कुछ निर्णयों पर न्यायिक रोक भी लगाई गई।

सरकार का तर्क है कि प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्थानों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना आवश्यक है। वहीं आलोचकों का कहना है कि ऐसे बड़े बदलाव व्यापक राजनीतिक सहमति और कानूनी प्रक्रिया के जरिए किए जाने चाहिए।

भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चर्चा में

सरकार की सबसे चर्चित उपलब्धियों में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच को तेज करना शामिल है। पूर्व राजनीतिक और प्रशासनिक पदाधिकारियों की संपत्तियों की जांच शुरू होने से राजनीतिक हलकों में हलचल मची हुई है।

सरकार का दावा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई किसी व्यक्ति या दल को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार के उद्देश्य से की जा रही है। हालांकि विपक्ष इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताता रहा है।

अतिक्रमण हटाओ अभियान बना विवाद का केंद्र

बालेन शाह की पहचान काठमांडू के मेयर रहते हुए सख्त अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई के लिए बनी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने इसी नीति को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाया।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों अवैध ढांचों को हटाया गया है। लेकिन इसके कारण बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं। कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए और सरकार पर गरीब एवं भूमिहीन लोगों की समस्याओं की अनदेखी करने के आरोप लगे।

मानवाधिकार समूहों का कहना है कि अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ प्रभावित लोगों के पुनर्वास की स्पष्ट योजना भी होनी चाहिए।

भारत सीमा से जुड़े फैसलों पर नाराजगी

नेपाल सरकार द्वारा भारत से आने वाले सामान पर कस्टम नियमों को सख्ती से लागू करने के फैसले ने भी विवाद खड़ा कर दिया है। सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कहना है कि वर्षों से चली आ रही स्थानीय व्यापार व्यवस्था प्रभावित हुई है।

दैनिक उपयोग की वस्तुओं, दवाइयों, कपड़ों और अन्य सामानों पर बढ़ी निगरानी और शुल्क के कारण लोगों में असंतोष बढ़ा है। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को राजस्व बढ़ाने और स्थानीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा।

अब आगे क्या?

बालेन शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने समर्थकों का विश्वास बनाए रखना है। जनता अभी भी उनसे उम्मीदें लगाए बैठी है, लेकिन उम्मीदों को बनाए रखने के लिए केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि ठोस परिणाम जरूरी होंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार के पास अभी भी स्थिति सुधारने का अवसर है। यदि आने वाले महीनों में अधूरे वादों पर तेज प्रगति दिखाई देती है, तो शुरुआती आलोचनाओं का प्रभाव कम हो सकता है। लेकिन यदि वर्तमान स्थिति बनी रहती है, तो नई राजनीति और बदलाव के प्रतीक के रूप में बनी उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

नेपाल की जनता अब घोषणाओं से आगे बढ़कर परिणाम देखना चाहती है। आने वाला समय तय करेगा कि बालेन शाह देश में वास्तविक परिवर्तन ला पाते हैं या फिर उनकी सरकार भी उन उम्मीदों का हिस्सा बनकर रह जाएगी जो सत्ता तक पहुंचने के बाद धीरे-धीरे फीकी पड़ जाती हैं।

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