नदी में बाढ़ का आना

नदी में बाढ़ का आना उसकी आंखो में चमक आना था इस बार बूढी दादी को छोटी छोटी मछलियां याद आई साथ याद आया उसे अपना बचपन गवना से पहले जब एक बार उसके गांव में बाढ़ आईं थीं सखी सहेली मिलकर, दुपट्टा हाथ में लिए दौड़ लगाई थी सबने एक साथ एक – एक […]

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inkhbar News
  • April 15, 2026 12:20 pm IST, Updated 2 hours ago

नदी में बाढ़ का आना

उसकी आंखो में चमक आना था
इस बार बूढी दादी को
छोटी छोटी
मछलियां याद आई
साथ याद आया
उसे अपना बचपन
गवना से पहले
जब एक बार उसके गांव में बाढ़ आईं थीं
सखी सहेली मिलकर,
दुपट्टा हाथ में लिए
दौड़ लगाई थी सबने एक साथ
एक – एक बित्ते के हाथों ने, पकड़ा दुपट्टे के चारों कोनों को ,
पानी में डुबोया,
और मछलियों के जाल में फंस जाने को उत्साहित ही थीं
ये मछलियां मछलियां नहीं थीं
साथ थीं, उमंग थीं,याराना थीं
अल्हड़ पन की ।
अब न नदी है
न बाढ़ है
उसके गांव में;
नदियों का सूखना
दादी की आंखो की चमक का विलुप्त हो जाना था
जैसे नदियां धीरे धीरे विलुप्ति के मुहाने पर खड़ी रो रही हैं|


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प्रियंका सोनकर

हिन्दी विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत

पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन (जनसत्ता, हंस, कथादेश, लमही, युग- परिबोध, कथाक्रम, कथानक, युद्धरत आम आदमी इत्यादि) 40 से अधिक प्रकाशित लेख एवं कविताएं ।
विशेषज्ञताः साहित्य, स्त्री अध्ययन और अस्मितामूलक विमर्श में रुचि ।
सम्पादन सहयोगः कथादेश के दलित साहित्य विशेषांक का अतिथि सम्पादन (2019).
पुरस्कार एवं सम्मान : दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले नेशनल फेलोशिप अवार्ड से सम्मानित 2015.
शोध-पत्र प्रस्तुतियां : पेरिस फ्रांस (2016) और लिस्बन, पुर्तगाल (2019), कनाडा 2022, न्यूयॉर्क (2023) , पुर्तगाल (2024) में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी संगोष्ठी में सहभागिता और शोध-पत्र प्रस्तुति, 7 देशों(फ्रांस , जर्मनी, स्पेन, फिनलैंड, , इटली, पुर्तगाल , नेपाल) की यात्रा ।

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