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एससी आरक्षण पर बढ़ा विवाद, अरुण भारती ने मांझी से मांगा जवाब

पटना। बिहार में अनुसूचित जाति (एससी) आरक्षण के उप-वर्गीकरण को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बाद लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के जमुई सांसद अरुण भारती ने भी केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी के रुख पर सवाल खड़े किए हैं। भारती ने आरोप […]

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  • August 31, 2026 10:45 am IST, Published 39 minutes ago

पटना। बिहार में अनुसूचित जाति (एससी) आरक्षण के उप-वर्गीकरण को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बाद लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के जमुई सांसद अरुण भारती ने भी केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी के रुख पर सवाल खड़े किए हैं। भारती ने आरोप लगाया कि आरक्षण में उप-वर्गीकरण की मांग को लेकर दलित समुदाय के भीतर विभाजन पैदा करने की कोशिश हो रही है।

अरुण भारती ने मांझी के उस तर्क पर भी सवाल उठाया, जिसमें उन्होंने अनुसूचित जातियों के बीच अधिक वंचित समुदायों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण की जरूरत पर जोर दिया था। भारती का कहना है कि इस मुद्दे पर बहस करने से पहले मांझी को अपने राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यकाल का हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए।

भारती ने विशेष रूप से बिहार का उदाहरण सामने रखते हुए सवाल उठाया। उनके मुताबिक, मांझी ने आरक्षण के उप-वर्गीकरण के समर्थन में पंजाब का उदाहरण दिया, लेकिन बिहार की स्थिति पर पर्याप्त चर्चा नहीं की। उन्होंने पूछा कि बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में मांझी के कार्यकाल के दौरान राज्य के सबसे पिछड़े माने जाने वाले मुसहर और भुइयां समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए।

यह विवाद ऐसे समय में बढ़ा है जब एससी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण का मुद्दा देश की राजनीति में महत्वपूर्ण बहस बन चुका है। उप-वर्गीकरण के समर्थकों का तर्क है कि अनुसूचित जाति की सूची में शामिल सभी समुदायों को आरक्षण का समान लाभ नहीं मिल पाया है। इसलिए अधिक पिछड़े और लंबे समय से अवसरों से वंचित समूहों के लिए आरक्षण के लाभ का एक हिस्सा सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

वहीं, इस व्यवस्था के विरोध में खड़े नेताओं की चिंता है कि उप-वर्गीकरण से अनुसूचित जाति समुदाय के भीतर सामाजिक और राजनीतिक विभाजन बढ़ सकता है। इसी मतभेद का असर अब एनडीए की राजनीति में भी दिखाई दे रहा है। बिहार में सहयोगी दलों के नेताओं के अलग-अलग बयान इस मुद्दे को और संवेदनशील बना रहे हैं।

अरुण भारती ने अपने बयान के जरिए यह संकेत भी दिया कि आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीतिक दलों को सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए। उनका आरोप है कि दलित समाज को अलग-अलग समूहों में बांटने के बजाय उन कारणों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जिनकी वजह से कुछ समुदाय अब भी शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अवसरों में पीछे हैं।

मुसहर और भुइयां समुदाय का उल्लेख करते हुए भारती ने यह सवाल उठाया कि केवल आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था या उसके भीतर बदलाव की चर्चा से वंचित समुदायों की वास्तविक स्थिति नहीं बदल सकती। इसके लिए शिक्षा, रोजगार, आर्थिक अवसर और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत है।

बिहार की राजनीति में इस विवाद के मायने इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि राज्य में दलित और महादलित समुदाय लंबे समय से चुनावी राजनीति का अहम आधार रहे हैं। अलग-अलग दल इन समुदायों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं। ऐसे में आरक्षण के उप-वर्गीकरण पर नेताओं के बीच बढ़ता मतभेद आने वाले समय में राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

फिलहाल, इस मुद्दे पर एनडीए के भीतर बहस थमने के बजाय तेज होती दिखाई दे रही है। चिराग पासवान और अरुण भारती के रुख के बाद अब नजर इस बात पर है कि जीतनराम मांझी इन आरोपों का क्या जवाब देते हैं और बिहार में गठबंधन के अन्य नेता इस संवेदनशील मुद्दे पर किस तरह अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं।

 

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