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बिहार में मार्कशीट पर नहीं होगा ‘फेल’, अब लिखी जाएगी नई बात

पटना: बिहार की शिक्षा व्यवस्था में एक अहम बदलाव की तैयारी की जा रही है, जिसका सीधा असर स्कूली बच्चों की मार्कशीट पर दिखाई दे सकता है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अगुवाई में राज्य सरकार शिक्षा व्यवस्था में कई बदलावों पर काम कर रही है। इनमें बच्चों को परीक्षा में असफल होने के बाद उनकी […]

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  • August 29, 2026 9:30 pm IST, Published 10 minutes ago

पटना: बिहार की शिक्षा व्यवस्था में एक अहम बदलाव की तैयारी की जा रही है, जिसका सीधा असर स्कूली बच्चों की मार्कशीट पर दिखाई दे सकता है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अगुवाई में राज्य सरकार शिक्षा व्यवस्था में कई बदलावों पर काम कर रही है। इनमें बच्चों को परीक्षा में असफल होने के बाद उनकी मार्कशीट पर लिखे जाने वाले ‘फेल’ शब्द को बदलने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। इसके स्थान पर बच्चे की क्षमता और आगे बढ़ने की संभावना को ध्यान में रखते हुए ‘कौशल के लिए पात्र’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है।

इस बदलाव का उद्देश्य केवल मार्कशीट की भाषा बदलना नहीं, बल्कि बच्चों के प्रति शिक्षा व्यवस्था के नजरिए में बदलाव लाना भी माना जा रहा है। सरकार की सोच है कि परीक्षा में अपेक्षित अंक हासिल नहीं कर पाने वाले बच्चे को सीधे ‘फेल’ कहने के बजाय उसकी सीखने और कौशल विकसित करने की क्षमता पर ध्यान दिया जाए।

मार्कशीट पर अब ‘फेल’ शब्द नहीं लिखने की तैयारी

सामने आई जानकारी के अनुसार, बिहार में किसी बच्चे की मार्कशीट पर अब ‘फेल’ शब्द नहीं लिखे जाने की दिशा में कदम उठाया जा रहा है। इसके स्थान पर प्रमाण पत्र में ‘कौशल के लिए पात्र’ शब्द का प्रयोग करने की योजना बताई गई है।

इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बच्चे की शैक्षणिक स्थिति को केवल पास या फेल के पारंपरिक पैमाने से देखने के बजाय उसके कौशल और क्षमता को महत्व देने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इस व्यवस्था के लागू होने के बाद परीक्षा परिणाम, अगली कक्षा में प्रवेश और प्रमाण पत्र से जुड़े नियम किस तरह होंगे, इसकी विस्तृत जानकारी आधिकारिक दिशा-निर्देशों के बाद ही स्पष्ट होगी।

सरकार क्यों बदलना चाहती है ‘फेल’ की भाषा?

शिक्षा के क्षेत्र में ‘फेल’ शब्द लंबे समय से विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम से जुड़ा रहा है। लेकिन कई बार परीक्षा में कम अंक आने के पीछे केवल बच्चे की क्षमता जिम्मेदार नहीं होती। पढ़ाई का माहौल, पारिवारिक परिस्थितियां, सीखने की गति और अलग-अलग विषयों में रुचि जैसे कई कारण भी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

ऐसे में सरकार का प्रस्तावित बदलाव बच्चों को नकारात्मक पहचान देने के बजाय उन्हें आगे सीखने के लिए प्रेरित करने की दिशा में एक कदम माना जा सकता है। ‘कौशल के लिए पात्र’ जैसे शब्द का इस्तेमाल बच्चे को यह संदेश दे सकता है कि परीक्षा का एक परिणाम उसकी पूरी क्षमता को निर्धारित नहीं करता।

हालांकि, केवल शब्द बदलने से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार संभव नहीं होगा। इसके साथ बच्चों की कमजोरियों को पहचानने, अतिरिक्त सहायता देने और कौशल आधारित शिक्षा को मजबूत करने की व्यवस्था भी जरूरी होगी।

5 सितंबर को शिक्षक दिवस पर बड़ा ऐलान संभव

सामने आई जानकारी के मुताबिक, मुख्यमंत्री 5 सितंबर को शिक्षक दिवस समारोह के अवसर पर शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यक्रमों और पहलों की जानकारी दे सकते हैं। इसी दौरान शिक्षक सहयोग पोर्टल लॉन्च किए जाने की भी बात कही गई है।

शिक्षक सहयोग पोर्टल के जरिए शिक्षकों को शैक्षणिक गतिविधियों, संसाधनों और आपसी सहयोग से जोड़ने की दिशा में काम किया जा सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से शिक्षकों को बेहतर शिक्षण सामग्री और जानकारी उपलब्ध कराने की कोशिश शिक्षा व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने में मदद कर सकती है।

हालांकि, पोर्टल के फीचर्स, उपयोग की प्रक्रिया और लॉन्च से जुड़ी अंतिम जानकारी आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।

बच्चों की पढ़ाई पर क्या पड़ेगा असर?

यदि ‘फेल’ शब्द की जगह कौशल आधारित शब्दावली को लागू किया जाता है तो इसका सबसे बड़ा असर विद्यार्थियों के मनोवैज्ञानिक नजरिए पर पड़ सकता है। परीक्षा में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं करने वाले बच्चों पर ‘फेल’ होने का सामाजिक और मानसिक दबाव कम करने की कोशिश की जा सकती है।

इसके साथ ही स्कूलों में ऐसे विद्यार्थियों की पहचान करना जरूरी होगा, जिन्हें अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता की जरूरत है। उदाहरण के लिए, किसी बच्चे को गणित में परेशानी है तो उसके लिए अलग से अभ्यास और मार्गदर्शन की व्यवस्था की जा सकती है। इसी तरह भाषा, विज्ञान या अन्य विषयों में कमजोर विद्यार्थियों के लिए भी सहायता आधारित मॉडल तैयार किया जा सकता है।

यानी बदलाव का वास्तविक फायदा तभी मिलेगा, जब मार्कशीट की भाषा बदलने के साथ रीमेडियल एजुकेशन, कौशल विकास और व्यक्तिगत सीखने पर भी ध्यान दिया जाए।

सिर्फ मार्कशीट नहीं, शिक्षा के नजरिए में बदलाव

बिहार में प्रस्तावित यह बदलाव शिक्षा व्यवस्था में एक व्यापक सोच की ओर संकेत करता है। पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा के परिणाम को अक्सर विद्यार्थी की सफलता का प्रमुख आधार माना जाता है। लेकिन आधुनिक शिक्षा में ज्ञान के साथ-साथ कौशल, रचनात्मकता, समस्या समाधान और व्यवहारिक समझ को भी महत्व दिया जा रहा है।

अगर बिहार सरकार इस दिशा में ठोस व्यवस्था तैयार करती है तो विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के अंक हासिल करने के बजाय अपने कौशल को विकसित करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

साथ ही अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। बच्चों को परीक्षा परिणाम के आधार पर हतोत्साहित करने के बजाय उनकी कमियों को समझकर उन्हें बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी होगा।

बदलाव की पूरी तस्वीर आधिकारिक नियमों के बाद साफ होगी

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर ‘फेल’ शब्द की जगह ‘कौशल के लिए पात्र’ जैसे शब्द के इस्तेमाल की बात सामने आई है। लेकिन यह बदलाव किस कक्षा से लागू होगा, किन परीक्षाओं में लागू होगा, अगली कक्षा में प्रमोशन के नियम क्या होंगे और प्रमाण पत्र का नया प्रारूप कैसा होगा—इन सवालों का जवाब आधिकारिक अधिसूचना के बाद ही मिलेगा।

इसलिए विद्यार्थियों और अभिभावकों को अंतिम नियमों के लिए शिक्षा विभाग की आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना चाहिए।

कुल मिलाकर, बिहार में मार्कशीट की भाषा बदलने का प्रस्ताव शिक्षा व्यवस्था में सोच के स्तर पर महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है। ‘फेल’ जैसे नकारात्मक शब्द के स्थान पर कौशल और क्षमता पर जोर देने वाली भाषा बच्चों को नई दिशा दे सकती है। अब देखने वाली बात होगी कि सरकार इस विचार को किस तरह नियमों और व्यावहारिक व्यवस्था में लागू करती है।

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