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श्रीराम के नाम पर राजनीति क्यों? प्रशांत किशोर ने भाजपा को घेरा

प्रशांत किशोर ने कहा कि भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और जीवन-मरण सब उनके हाथ में है। ऐसे में यह कहना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीने भगवान श्रीराम को उनका घर दिलाया, उनके मुताबिक अहंकार की पराकाष्ठा है।

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Prashant Kishor
Gauravshali Bharat News
  • October 18, 2026 5:10 pm IST, Published 58 minutes ago
बिहार की आठ एमएलसी सीटों पर 23 अक्टूबर को होने वाले मतदान से पहले राज्य की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। चुनावी माहौल के बीच जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसादयादव को अलग-अलग मुद्दों पर घेरने की कोशिश की है। धार्मिक आस्था, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक न्याय जैसे सवालों को उठाकर पीके नेचुनावी बहस को नया मोड़ देने की रणनीति अपनाई है। भगवान श्रीराम को लेकर दिया गया उनका बयान भी अब राजनीतिक चर्चा का विषय बनगया है।

प्रशांत किशोर इससे पहले अपने ‘कुत्ता-बिल्ली’ वाले बयान को लेकर सुर्खियों में रहे थे। अब उन्होंने भगवान श्रीराम और राम मंदिर से जुड़ेराजनीतिक विमर्श के बहाने भाजपा पर निशाना साधा है। उनके बयान को आगामी मतदान से पहले भाजपा के धार्मिक और राजनीतिक नैरेटिवको चुनौती देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पीके ने अपने तर्क के जरिए यह सवाल उठाया है कि भगवान श्रीराम जैसी आस्था केप्रतीक के संदर्भ में किसी राजनीतिक नेता की भूमिका को किस तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

दरअसल, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के एक बयान का जिक्र करते हुए प्रशांत किशोर ने भाजपा पर कटाक्ष किया। सम्राट चौधरी के बयान केमुताबिक, भगवान श्रीराम को अपने घर के लिए करीब 400 वर्षों तक इंतजार करना पड़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें उनका घर दिलाया।इस कथन को आधार बनाकर प्रशांत किशोर ने भाजपा की राजनीति पर सवाल खड़े किए। उन्होंने धार्मिक आस्था और राजनीतिक श्रेय लेने केबीच के संबंध को लेकर अपनी बात रखी।

प्रशांत किशोर ने कहा कि भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और जीवन-मरण सब उनके हाथ में है। ऐसे में यह कहना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीने भगवान श्रीराम को उनका घर दिलाया, उनके मुताबिक अहंकार की पराकाष्ठा है। उनके इस बयान का मूल निशाना भाजपा की वह राजनीतिकशैली है, जिसमें राम मंदिर निर्माण और धार्मिक प्रतीकों को राजनीतिक उपलब्धियों के तौर पर प्रस्तुत किया जाता रहा है।

पीके के बयान से बिहार में धार्मिक मुद्दों पर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है। भाजपा लंबे समय से राम मंदिर को अपनी प्रमुखउपलब्धियों में गिनाती रही है। पार्टी के समर्थक इसे करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा ऐतिहासिक विषय मानते हैं। दूसरी ओर, विपक्षी दलोंके नेता अक्सर धार्मिक भावनाओं के राजनीतिक इस्तेमाल पर सवाल उठाते रहे हैं। प्रशांत किशोर की ताजा टिप्पणी भी इसी व्यापक बहस काहिस्सा मानी जा रही है।

हालांकि, प्रशांत किशोर की रणनीति केवल भाजपा को घेरने तक सीमित नहीं है। वह शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को उठाकर नीतीशकुमार और लालू प्रसाद यादव की राजनीति पर भी सवाल कर रहे हैं। बिहार में शिक्षा की गुणवत्ता, युवाओं के भविष्य, रोजगार और सामाजिकअवसरों की उपलब्धता लंबे समय से राजनीतिक बहस के अहम विषय रहे हैं। इन सवालों को सामने रखकर पीके राज्य की प्रमुख राजनीतिकताकतों के कामकाज और उनके दावों पर चर्चा केंद्रित करना चाहते हैं।

नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राजनीति में शिक्षा, विकास और सुशासन के मुद्दे प्रमुख रहे हैं, जबकि लालू प्रसाद यादव की राजनीति सामाजिकन्याय और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व के सवालों से जुड़ी रही है। प्रशांत किशोर इन दोनों राजनीतिक धाराओं के सामने मौजूदा हालात औरजनता की अपेक्षाओं से जुड़े सवाल रख रहे हैं। उनका प्रयास है कि चुनावी चर्चा केवल परंपरागत राजनीतिक समीकरणों और आरोप-प्रत्यारोपतक सीमित न रहे, बल्कि शिक्षा और सामाजिक बदलाव जैसे विषय भी केंद्र में आएं।

बिहार की आठ एमएलसी सीटों पर होने वाला मतदान ऐसे समय में हो रहा है, जब राजनीतिक दलों के बीच अपनी विचारधारा और उपलब्धियोंको जनता के सामने रखने की होड़ बढ़ गई है। प्रशांत किशोर के बयानों से यह संकेत मिलता है कि जन सुराज धार्मिक विमर्श के साथ-साथ शिक्षा और सामाजिक न्याय के मुद्दों को भी अपनी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बना रहा है।

अब देखना होगा कि प्रशांत किशोर की यह रणनीति चुनावी बहस को कितना प्रभावित करती है और भाजपा समेत बिहार के अन्य प्रमुख राजनीतिक दल इन सवालों का किस तरह जवाब देते हैं। फिलहाल, भगवान श्रीराम को लेकर दिया गया बयान राज्य की सियासत में नई चर्चा का कारण बन गया है।

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