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UPI यूजर्स के लिए बड़ी खबर! दुकानदार नहीं वसूल सकेंगे MDR

नई दिल्ली। डिजिटल भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों के लिए यूपीआई (UPI) से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि यूपीआई के माध्यम से भुगतान करने वाले ग्राहकों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) का अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जा सकता। इसका […]

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  • November 6, 2026 1:23 pm IST, Published 32 seconds ago

नई दिल्ली। डिजिटल भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों के लिए यूपीआई (UPI) से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि यूपीआई के माध्यम से भुगतान करने वाले ग्राहकों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) का अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जा सकता। इसका मतलब है कि दुकानदार या व्यापारी यूपीआई भुगतान स्वीकार करने के बदले ग्राहकों से अलग से प्लेटफॉर्म फीस या अन्य शुल्क वसूल नहीं कर सकेंगे। NPCI ने अदालत में दाखिल अपने जवाब में संशोधित यूपीआई शुल्क व्यवस्था का बचाव करते हुए कहा है कि यह व्यवस्था डिजिटल भुगतान के पूरे इकोसिस्टम को आर्थिक रूप से मजबूत बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट में NPCI ने क्या कहा?

NPCI ने 3 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल किया। यह मामला यूपीआई के कुछ चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर MDR शुल्क लगाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका से संबंधित है।

इससे पहले 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, NPCI और अन्य संबंधित पक्षों से इस व्यवस्था के संबंध में जवाब मांगा था। याचिकाकर्ता ने 2,000 रुपये से अधिक के कुछ यूपीआई पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) भुगतान पर MDR लगाने के निर्णय को चुनौती दी थी।

याचिका में इस व्यवस्था के कानूनी आधार और आम ग्राहकों तथा व्यापारियों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए गए थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उस समय संशोधित व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

अब NPCI ने अपने जवाब में स्पष्ट किया है कि MDR शुल्क का भुगतान ग्राहकों से नहीं कराया जा सकता। यूपीआई एप्लीकेशन प्रोवाइडर भी ग्राहकों पर भुगतान करने के लिए प्लेटफॉर्म फीस या दूसरे अतिरिक्त शुल्क नहीं लगा सकते।

ग्राहकों को नहीं देना होगा अतिरिक्त भुगतान शुल्क

NPCI के हलफनामे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट का बोझ सीधे ग्राहकों पर डालने की अनुमति नहीं होगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं को अलग से भुगतान शुल्क देने के लिए मजबूर न होना पड़े।

NPCI ने अदालत को बताया है कि MDR को ग्राहकों से वसूलना संबंधित नियमों और सेवा समझौतों का उल्लंघन होगा। ऐसे मामलों में संबंधित बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और थर्ड पार्टी एप्लीकेशन प्रोवाइडर के खिलाफ अनुपालन संबंधी कार्रवाई की जा सकती है।

गंभीर उल्लंघन की स्थिति में संबंधित संस्थाओं की यूपीआई सदस्यता और सुविधाएं समाप्त किए जाने तक की कार्रवाई संभव है।

इस स्पष्टीकरण से उन ग्राहकों को राहत मिलने की उम्मीद है जो रोजाना किराना दुकान, रेस्टोरेंट, मेडिकल स्टोर, पेट्रोल पंप और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर क्यूआर कोड के जरिए भुगतान करते हैं।

2,000 रुपये तक के भुगतान पर क्या रहेगा नियम?

संशोधित MDR व्यवस्था में प्रत्येक यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाने का प्रावधान नहीं है। NPCI और केंद्र सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि आम लोगों के बीच होने वाले पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांजैक्शन पहले की तरह पूरी तरह निःशुल्क रहेंगे।

इसके अलावा 2,000 रुपये तक के पात्र पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) भुगतान पर MDR नहीं लगेगा। छोटे व्यापारियों को भी निर्धारित शर्तों के तहत शून्य MDR की सुविधा जारी रहेगी।

इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति द्वारा अपने दोस्त, रिश्तेदार या परिवार के सदस्य को यूपीआई के माध्यम से पैसे भेजने पर राशि की कोई सीमा निर्धारित करके MDR नहीं लगाया जाएगा।

इसी तरह सामान्य खरीदारी में 2,000 रुपये तक के पात्र मर्चेंट भुगतान पर भी ग्राहक को MDR नहीं देना होगा।

2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर कितना लगेगा MDR?

संशोधित ढांचे के तहत 2,000 रुपये से अधिक के पात्र मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर अधिकतम 0.4 प्रतिशत MDR निर्धारित किया गया है। यह शुल्क ग्राहक से नहीं, बल्कि संबंधित मर्चेंट भुगतान व्यवस्था के तहत लिया जाने वाला शुल्क है।

हालांकि, सभी क्षेत्रों के लिए एक जैसी दर निर्धारित नहीं की गई है। रेलवे, टेलीकॉम, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे आवश्यक एवं कम मुनाफे वाले क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के पात्र भुगतान पर प्रति ट्रांजैक्शन 5 रुपये का निर्धारित MDR रखा गया है।

वहीं म्यूचुअल फंड, सिक्योरिटीज, स्टॉक ब्रोकर और डीलर से संबंधित पात्र भुगतान पर 0.02 प्रतिशत MDR निर्धारित किया गया है। निर्धारित व्यवस्था में 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर सामान्य MDR की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन रखी गई है। इन दरों का उद्देश्य भुगतान प्रणाली से जुड़े बैंकों, सेवा प्रदाताओं और तकनीकी संस्थाओं की परिचालन लागत को पूरा करने में सहायता करना है।

NPCI ने क्यों जरूरी बताया नया शुल्क ढांचा?

NPCI का कहना है कि यूपीआई देश में डिजिटल भुगतान का एक प्रमुख माध्यम बन चुका है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग इसके जरिए लेनदेन करते हैं। इस व्यवस्था को लगातार संचालित करने के लिए तकनीकी ढांचे, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने, बैंकिंग नेटवर्क और ग्राहक सहायता पर लगातार निवेश करना पड़ता है।

NPCI के अनुसार, लंबे समय तक शून्य MDR व्यवस्था के कारण डिजिटल भुगतान प्रणाली के संचालन और रखरखाव की लागत तथा उससे होने वाली आय के बीच अंतर पैदा हुआ है।

ऐसे में संशोधित शुल्क ढांचे का उद्देश्य इस अंतर को कम करना और यूपीआई व्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखना है।

NPCI ने अदालत को यह भी बताया कि लगभग 70 प्रतिशत यूपीआई लेनदेन पर्सन-टू-पर्सन श्रेणी में आते हैं। वहीं करीब 96 प्रतिशत पर्सन-टू-मर्चेंट लेनदेन 2,000 रुपये या उससे कम मूल्य के हैं। इसलिए नए MDR ढांचे से अधिकांश सामान्य डिजिटल भुगतान प्रभावित नहीं होंगे।

छोटे दुकानदारों को राहत देने की भी व्यवस्था

संशोधित व्यवस्था में छोटे व्यापारियों को विशेष राहत देने का प्रावधान किया गया है। निर्धारित पात्रता के अनुसार, जिन छोटे व्यापारियों को यूपीआई क्यूआर कोड के माध्यम से प्रतिमाह एक लाख रुपये तक की राशि प्राप्त होती है, उन्हें P2PM श्रेणी के तहत शून्य MDR की सुविधा मिलती रहेगी।

इसके अलावा 20 लाख रुपये तक वार्षिक कारोबार वाले छोटे व्यापारियों के बीच डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष सहायता कोष का प्रस्ताव भी सामने रखा गया है।

इसका उद्देश्य सड़क किनारे दुकान लगाने वाले विक्रेताओं, छोटे किराना कारोबारियों और स्थानीय दुकानदारों को डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जोड़कर रखना है।

क्या यूपीआई शुल्क व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगी है?

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को संशोधित MDR व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया था। अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था। इसके बाद NPCI ने 3 नवंबर को अपना हलफनामा दाखिल किया।

इसलिए NPCI का ग्राहकों से MDR नहीं वसूलने संबंधी स्पष्टीकरण अदालत में दाखिल जवाब का हिस्सा है। इसे सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला या पूरी शुल्क व्यवस्था पर लगी रोक नहीं समझना चाहिए।

वहीं NPCI ने त्योहारी सीजन को देखते हुए अक्टूबर में प्रस्तावित शुल्क व्यवस्था के क्रियान्वयन को दिवाली के बाद तक टालने का निर्णय भी लिया था। नई लागू होने की तारीख अलग से अधिसूचित किए जाने की बात कही गई थी।

डिजिटल भुगतान करने वालों के लिए क्या है इसका मतलब?

कुल मिलाकर, यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए सबसे बड़ी राहत यही है कि सामान्य व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले भुगतान मुफ्त रहेंगे। 2,000 रुपये तक के पात्र मर्चेंट भुगतान पर भी MDR नहीं लगेगा। वहीं 2,000 रुपये से अधिक के कुछ चुनिंदा व्यावसायिक भुगतानों पर निर्धारित शुल्क लागू होगा, लेकिन NPCI के अनुसार इसका अतिरिक्त बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला जा सकता।

आने वाले समय में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और संबंधित पक्षों के जवाब महत्वपूर्ण होंगे। इससे यह स्पष्ट होगा कि संशोधित MDR व्यवस्था को लेकर उठाए गए कानूनी सवालों पर अदालत का अंतिम रुख क्या रहता है।

फिलहाल डिजिटल भुगतान करने वाले लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। सामान्य यूपीआई भुगतान व्यवस्था में मुफ्त लेनदेन की सुविधा बरकरार रखने का प्रावधान किया गया है।

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