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मुंबई जलभराव पर हाई कोर्ट सख्त, नागरिकों को ठहराया जिम्मेदार

मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में हर साल मानसून के दौरान होने वाले भीषण जलभराव को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शहर में बारिश के दौरान बनने वाली बाढ़ जैसी स्थिति केवल प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह नागरिकों और विभिन्न एजेंसियों की […]

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  • July 10, 2026 3:30 pm IST, Published 31 minutes ago

मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में हर साल मानसून के दौरान होने वाले भीषण जलभराव को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शहर में बारिश के दौरान बनने वाली बाढ़ जैसी स्थिति केवल प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह नागरिकों और विभिन्न एजेंसियों की लापरवाही का परिणाम है। हाई कोर्ट ने कहा कि अवैध कब्जे, नालियों में कचरा फेंकने की आदत, सार्वजनिक स्थानों का अतिक्रमण और शहरी नियोजन की अनदेखी ने मुंबई को हर मानसून में संकट की स्थिति में पहुंचा दिया है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविंद्र वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन करें और सार्वजनिक संपत्तियों का संरक्षण करें तो शहर में जलभराव की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। अदालत ने इस मुद्दे पर प्रशासन और नागरिकों दोनों की जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

अदालत ने नागरिकों की आदतों पर जताई चिंता

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि मुंबई जैसे महानगर में बारिश के समय जलभराव का सबसे बड़ा कारण नालियों का जाम होना है। लोग बड़ी मात्रा में कचरा नालों और सीवर लाइनों में फेंक देते हैं, जिससे पानी की निकासी बाधित हो जाती है। अदालत ने कहा कि जब तक नागरिक अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझेंगे, तब तक केवल सरकारी एजेंसियों को दोष देना उचित नहीं होगा।

खंडपीठ ने कहा कि शहर की सड़कों, फुटपाथों और सार्वजनिक स्थलों पर लगातार अतिक्रमण हो रहा है। कई स्थानों पर अवैध पार्किंग और फुटपाथों पर दुकानें लगने से जल निकासी की व्यवस्था प्रभावित होती है। ऐसे में भारी बारिश के दौरान पानी सड़कों पर भर जाता है और आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

अवैध कब्जों पर भी अदालत की सख्त टिप्पणी

हाई कोर्ट ने कहा कि शहर में बड़ी संख्या में लोग सरकारी और सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जा कर लेते हैं। जब प्रशासन कार्रवाई करता है तो वही लोग अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अपनी ही मातृभूमि को नुकसान पहुंचाना समाज की आदत बनती जा रही है। यदि लोग नियमों का पालन करें और अवैध निर्माण से बचें तो शहर की आधारभूत संरचना बेहतर तरीके से काम कर सकती है।

अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक सुविधाओं का दुरुपयोग शहर की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बन चुका है। नालियों, जल निकासी मार्गों और खुले स्थानों पर अतिक्रमण के कारण बारिश का पानी निकल नहीं पाता और पूरा इलाका जलमग्न हो जाता है।

प्रशासन की भूमिका पर भी उठे सवाल

हाई कोर्ट ने नगर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि केवल नागरिकों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित विभागों को समय रहते नालों की सफाई, अतिक्रमण हटाने और जल निकासी व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि मानसून शुरू होने से पहले आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली जाएं तो हर साल बनने वाली जलभराव की स्थिति से काफी हद तक बचा जा सकता है। प्रशासन को आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक योजना के आधार पर शहर की ड्रेनेज व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए।

सड़क चौड़ीकरण परियोजना पर भी नोटिस

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने नागरिक सुविधाओं से जुड़े एक अन्य मामले में रायगढ़ जिले के मंडाला गांव स्थित सड़क चौड़ीकरण परियोजना को लेकर परमाणु ऊर्जा विभाग को औपचारिक नोटिस जारी किया। अदालत ने संबंधित पक्षों से परियोजना की वर्तमान स्थिति और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है।

इस मामले में अदालत ने संकेत दिया कि सार्वजनिक परियोजनाओं में देरी और समन्वय की कमी का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। इसलिए सभी विभागों को समयबद्ध तरीके से कार्य पूरा करना चाहिए।

हर साल मानसून में दोहराई जाती है समस्या

मुंबई में मानसून के दौरान कई इलाकों में जलभराव आम बात बन चुकी है। भारी बारिश के कारण सड़कें, रेलवे ट्रैक और निचले इलाके पानी में डूब जाते हैं। इससे यातायात प्रभावित होता है, कार्यालयों और स्कूलों का काम बाधित होता है तथा लाखों लोगों को घंटों तक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अनियोजित शहरीकरण, जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण, प्लास्टिक कचरे का बढ़ता उपयोग और प्राकृतिक जलमार्गों का समाप्त होना इस समस्या के प्रमुख कारण हैं। यदि इन मुद्दों पर गंभीरता से काम नहीं किया गया तो भविष्य में स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है।

नागरिकों और प्रशासन दोनों की साझा जिम्मेदारी

हाई कोर्ट की टिप्पणी केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वच्छता बनाए रखना, सार्वजनिक संपत्तियों की रक्षा करना और नियमों का पालन करना हर नागरिक का दायित्व है। वहीं प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह समय पर सफाई, अतिक्रमण हटाने और बेहतर शहरी प्रबंधन सुनिश्चित करे।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नागरिक और प्रशासन मिलकर कार्य करें तो मुंबई जैसे महानगर में मानसून के दौरान होने वाले जलभराव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी आने वाले समय में शहर के विकास और शहरी प्रबंधन को लेकर नई बहस को जन्म दे सकती है।

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